भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 275, कुल 638 में से

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२८४ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश सिंह लग्न : पञ्चमभाव : शनि पाँचवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के पक्ष में कुछ परेशानी रहती है। तीसरी दृष्टि से स्व- राशि में सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय से सुख मिलता है। स्त्री बुद्धिमती होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से एकादश-भाव को देखने से आय में वृद्धि होती है। दसवीं मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन की वृद्धि होती है तथा सामान्य कौटुम्बिक सुख भी मिलता है। ऐसा जातक बड़ा विषयी होता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश सिंह लग्न : षष्ठभाव : शनि छठे भाव में स्वराशिस्थ शनि के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर प्रभावी रहता है तथा ननिहाल से भी शक्ति प्राप्त करता है। दैनिक खर्च के संचालन में तथा स्त्री-पक्ष से कुछ असन्तोष रहता है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने के कारण पुरातत्त्व का सामान्य लाभ होता है, परन्तु आयु के विषय में कुछ अशान्ति रहती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक होता है, जिससे परेशानी रहती है। दसवीं उच्चदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से पराक्रम की वृद्धि होती है तथा भाई- बहिनों का सुख मिलता है। ऐसा व्यक्ति हिम्मत से कठिनाइयों पर विजय पाता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश सिंह लग्न : सप्तमभाव : शनि सातवें भाव में स्वराशिस्थ शनि के प्रभाव से जातक की स्त्री-पक्ष तथा दैनिक व्यवसाय में कठिनाइयाँ बनी रहती हैं। शत्रु-पक्ष पर प्रभाव रहता है। तीसरी नीचदृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की कुछ हानि होती है तथा यश में कमी आती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य एवं मानसिक शक्ति का ह्रास होता है। दसवीं शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन के सुख में भी कमी आ जाती है।

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