भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 281, कुल 638 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 281

२६० 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश सिंह लग्न : एकादशभाव : राहु ग्यारहवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव के जातक की आमदनी में बहुत वृद्धि होती है तथा कभी-कभी आकस्मिक धन-लाभ भी होता है। वह अपने धैर्य, साहस, परिश्रम तथा गुप्त युक्तियों के बल पर लाभ को बढ़ाता रहता है, परन्तु कभी-कभी उसे हानि भी उठानी पड़ती है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश सिंह लग्न : द्वादशभाव : राहु बारहवें भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक को अपना खर्च चलाने के लिए हर समय चिन्तित रहना पड़ता है तथा कभी-कभी घोर कष्टों का सामना भी करना पड़ता है। उसे बाहरी सम्बन्धों से भी हानि पहुँचती है। परन्तु गुप्त युक्तियों, परिश्रम तथा साहस के बल पर वह थोड़ी-बहुत सफलता भी प्राप्त कर लेता है। 'सिंह' लग्न में 'केतु' का फलादेश 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश सिंह लग्न : प्रथमभाव : केतु पहले भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक के शारीरिक स्वास्थ्य एवं सौन्दर्य में कमी आती है तथा कभी बाहरी चोट भी लगती है, जिसका शरीर पर स्थायी चिह्न बन जाता है। ऐसा व्यक्ति भीतर से काफी चिन्तित रहता है तथा सुख पाने के लिए कठिन परिश्रम करता है।