भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६२ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश सिंह लग्न : पंचमभाव : केतु पाँचवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित उच्च के केतु के प्रभाव से जातक की सन्तान-पक्ष से शक्ति मिलती है, परन्तु कभी-कभी कष्ट भी उठाने पड़ते हैं। विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में परिश्रम करने पर भी अधिक सफलता नहीं मिलती। ऐसा व्यक्ति स्वयं को बुद्धिमान् भी समझता है, परन्तु उसकी वाणी में प्रभाव नहीं होता। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश सिंह लग्न : षष्ठभाव : केतु छठे भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक अपने परिश्रम द्वारा शत्रु पर विजय प्राप्त करता है। वह बड़ा हिम्मती तथा धैर्यवान् होता है। गुप्त युक्तियों तथा आन्तरिक साहस के बल पर वह निरन्तर आगे बढ़ने का प्रयत्न करता है तथा मुसीबतें आने पर भी घबराता नहीं है। उसे अपने ननिहाल पक्ष से हानि भी उठानी पड़ती है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश सिंह लग्न : सप्तमभाव : केतु सातवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक की स्त्री-सुख तथा व्यवसाय-पक्ष में कमी का सामना करना होता है। वह अपने साहस, धैर्य तथा गुप्त युक्तियों के बल पर गृहस्थी को चलाता है। कभी-कभी बड़ी मुसीबतों में भी फँसता है, परन्तु धैर्य तथा साहस को नहीं छोड़ता और अन्त में सफलता पाकर ही रहता है। उसकी मूत्रेन्द्रिय में विकार होने की संभावना भी रहती है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश सिंह लग्न : अष्टमभाव : केतु आठवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक को जीवन में अनेक बार मृत्यु-तुल्य कष्टों का सामना करना पड़ता है तथा पुरातत्त्व की हानि भी उठानी पड़ती है। वह सदैव चिन्तित रहता है, फिर भी धैर्य और साहस को नहीं छोड़ता। और परिश्रम तथा गुप्त युक्तियों के बल पर वह कठिनाइयों पर विजय पाता है। उसके पेट के निम्न भाग में कुछ विकार भी रहता है।