भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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२६३ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश सिंह लग्न : नवमभाव : केतु नवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में बाधाएँ आती हैं तथा धर्म के पक्ष में भी कमजोरी रहती है। वह कठिन परिश्रम करने पर भी यशस्वी नहीं बन पाता तथा कभी-कभी घोर संकटों में पड़ जाता है। भाग्यहीन होने पर भी वह अपने परिश्रम, धैर्य, साहस तथा गुप्त युक्तियों के बल पर कुछ सफलता एवं शक्ति प्राप्त कर लेता है। 'सिंह लग्न' की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश सिंह लग्न : दशमभाव : केतु दसवें भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक को पिता से कुछ कष्ट मिलता है तथा राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता पाने के लिए घोर परिश्रम करना पड़ता है। वह अपने धैर्य, साहस, चातुर्य, बुद्धि-बल तथा परिश्रम द्वारा कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करता हुआ आगे बढ़ता है और तरक्की भी करता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश सिंह लग्न : एकादशभाव : केतु ग्यारहवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक को धन की कमी का दुःख विशेष रूप से अनुभव होता है तथा वह अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए घोर परिश्रम तथा संघर्ष करता है। वह लाभ उठाने के लिए उचित-अनुचित का विचार भी नहीं करता तथा गुप्त युक्तियों एवं धैर्य के बल पर कठिनाइयों को पार कर लेता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'केतु का फलादेश सिंह लग्न : द्वादशभाव : केतु बारहवें भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक अपने खर्च को बड़ी कठिनाई से चला पाता है। उसे मानसिक चिन्ताएँ तथा परेशानियां घेरे रहती हैं। वह अनेक बार संकटों तथा हानियों का सामना करता है, परन्तु अपने गुप्त धैर्य, युक्तिबल, परिश्रम तथा साहस के बल पर उन कठिनाइयों पर विजय पाता हुआ अपने काम को जैसे-तैसे चलाता रहता है।