भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 285, कुल 638 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 285

२६४ ‘कन्या’ लग्न ६६० [‘कन्या’ लग्न की कुण्डलियों के विभिन्न गृहों में स्थित विभिन्न ग्रहों के फलादेश का पृथक्-पृथक् वर्णन] ‘कन्या लग्न’ का फलादेश ‘कन्या’ लग्न में जन्म लेने वाले जातक का शरीर सामान्य अथवा स्थूल और सुन्दर होता है। इसकी आँखें बड़ी-बड़ी होती हैं। यह कफ एवं पित्त प्रकृतिवाला, सत्यभाषी, प्रियवादी, गंभीर, भावुक-मिजाज, अपने मन की बात की छिपाने वाला, सदैव प्रसन्न रहने वाला, चतुर, काम-क्रीड़ा-कुशल, मायावी, भोगी, विचारशील, डरपोक, यात्रा-प्रेमी, गणितज्ञ, धर्म में रुचि रखने वाला तथा अनेक प्रकार के गुणों तथा कला-कौशलों से युक्त होता है। इसे सुन्दर स्त्री प्राप्त होती है तथा कन्या-सन्तति अधिक होती है। यह भ्रातृ-द्रोही तथा स्त्री द्वारा पराजित भी होता है। इस लग्न वाला जातक बाल्यावस्था में सुखी, मध्यमावस्था में सामान्य तथा अन्तिमावस्था में दुःख भोगने वाला होता है। इसका भाग्योदय २४ से ३६ वर्ष की आयु के बीच होता है। इसी अवधि में यह अपने धर्म तथा ऐश्वर्य की वृद्धि करता है, परन्तु यह अन्त तक नहीं टिक पाता।