भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५ इस भाव में मेष, वृष तथा सिंह राशियां, धनु राशि का उत्तरार्द्ध तथा मकर राशि का पूर्वार्द्ध बलवान होता है । इस भाव के कारक सूर्य, बुध, बुध तथा शनि हैं । (११) ग्यारहवां भाव— इसे एकादश, लाभ, आय, उपचय, पणफर आदि नामों से भी पुकारा जाता है । इसके द्वारा जातक की आय, सम्पत्ति, ऐश्वर्य, रत्न, वाहन, मांगलिक-कार्य आदि के सम्बन्ध में विचार किया जाता है । इस भाव का कारक 'गुरु' है । (१२) बारहवां भाव— इसे द्वादश, व्यय, त्रिक आदि नामों से भी पुकारा जाता है । इसके द्वारा जातक के व्यय, व्यसन, दान, बाहरी-सम्बन्ध, यात्रा, रोग, दण्ड, हानि आदि के सम्बन्ध में विचार किया जाता है । इस भाव का कारक 'शनि' है । विभिन्न नामों से प्रमुख विचारणीय विषय निम्नांकित कुण्डली चक्र में प्रदर्शित हैं :— विभिन्न भावों के विचारणीय विषय
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| तीसरा भाव: | दूसरा भाव: | पहला भाव: | बारहवाँ भाव: |
| सहोदर, धैर्य, | धन, कुटुम्ब | शरीर, आकृति, | व्यय, हानि, |
| पराक्रम | | मस्तिष्क, जाति, | दण्ड |
|-----------------+-----------------+ आयु, विवेक, शील +-----------------|
| चौथा भाव: | | ग्यारहवाँ भाव:|
| माता, सुख, भूमि, भवन, सवारी, +--------------------+ आय, लाभ, |
| सम्पत्ति, दया, दान | दसवाँ भाव: | सम्पत्ति |
|-----------------+-----------------+ राज्य, पिता, कर्म,+-----------------|
| पाँचवाँ भाव: | छठा भाव: | व्यवसाय, नौकरी, | नवॉँ भाव: |
| सन्तान, बुद्धि,| शत्रु, रोग, | अधिकार, यश | धर्म, भाग्य, |
| विद्या | चिन्ता, मामा, +--------------------+ तीर्थ, दान |
| | कष्ट | सातवाँ भाव: +-----------------|
| | | स्त्री, विवाह, | आठवाँ भाव: |
| | | प्रेम, दैनिक आय, | जीवन, मृत्यु, |
| | | स्वास्थ्य, मित्र, | पुरातत्त्व, |
| | | झगड़े | ऋण, संकट |
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विभिन्न भाव के कारक ग्रहों को आगे दिए गए कुण्डलीचक्र में प्रदर्शित किया गया है—