भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१० 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कन्या लग्न : षष्ठभाव : मंगल छठे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर विजय पाता है। वह परिश्रमी तथा पुरुषार्थी होता है, परन्तु भाई- बहिनों में कुछ विरोध रहता है । आयु तथा पुरातत्त्व का अच्छा लाभ होता है । चौथी शत्रु-दृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य एवं धर्म के क्षेत्र में कमजोरी रहती है । सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है । आठवीं शत्रु-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक स्वास्थ्य में कमी तथा रक्त-विकार आदि रोग रहते हैं । 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कन्या लग्न : सप्तमभाव : मंगल सातवें भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक को स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कष्ट मिलता है तथा आयु एवं पुरातत्त्व की वृद्धि होती है । पराक्रम बढ़ता है तथा भाई-बहिनों के सुख मे न्यूनाधिकता बनी रहती है । चौथी मित्र-दृष्टि से दशमभाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में उन्नति होती है । सातवीं शत्रु-दृष्टि से प्रथम- भाव को देखने से शरीर में कुछ परेशानियां रहती हैं । आठवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीय- भाव को देखने से धन-संचय तथा कौटुम्बिक सुख में भी कमी बनी रहती है । 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कन्या लग्न : अष्टमभाव : मंगल आठवें भाव मे स्वराशि में स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक को आयु एवं पुरातत्त्व का लाभ होता है, परन्तु भाई-बहिन के सुख में कमी आती है । चौथी नीच दृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी के क्षेत्र में कुछ कमी रहती है । सातवीं शत्रुदृष्टि से द्वितीयभाव' को देखने मे धन-संचय तथा कौटुम्बिक सुख में कुछ असंतोष रहता है । आठवीं दृष्टि से स्वराशि के तृतीयभाव को देखने से पराक्रम तथा भाई-बहिन के सुख में वृद्धि होती है तथा गुप्त हिम्मत बढ़ती है ।