भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१७ 'कन्या' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कन्या लग्न : तृतीयभाव : गुरु तीसरे भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक के पराक्रम तथा भाई-बहिन के सुख में वृद्धि होती है और माता, भूमि तथा भवन का सुख भी प्राप्त होता है। पाँचवीं दृष्टि से स्वराशि में सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष से भी सफलताएँ मिलती हैं। स्त्री सुन्दर मिलती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य तथा धर्म के क्षेत्र में कुछ रुकावटों के साथ उन्नति होती है। नवीं उच्चदृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी बहुत अच्छी रहती है। ऐसा जातक धनी तथा सुखी रहता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली से 'चतुर्थभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कन्या लग्न : चतुर्थभाव : बुध चौथे भाव में स्वक्षेत्री 'गुरु' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा भवन का यथेष्ट सुख मिलता है। स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलताएँ मिलती हैं। पाँचवीं मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। सातवीं मित्र- दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सफलताएं मिलती रहती हैं। नवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में लाभ मिलता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कन्या लग्न : पंचमभाव : गुरु पाँचवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर नीच के गुरु के प्रभाव से जातक की सन्तान पक्ष से कष्ट मिलता है तथा विद्या एवं बुद्धि में कमी रहती है। मातृ- पक्ष भी कमजोर रहता है। पांचवी शत्रु-दृष्टि से नवम- भाव को देखने से भाग्य एवं धर्म की सामान्य वृद्धि होती है। सातवीं उच्च-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी में वृद्धि होती है तथा नवीं मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक, शक्ति, सम्मान, प्रभाव एवं कार्य-कुशलता में वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति सुखी तथा सामान्य धनी होता है।