भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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३१६ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कन्यालग्न : द्वादशभाव : बुध बारहवें भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक होता है तथा बाहरी स्थानों के सम्पर्क से सम्मान तथा लाभ की प्राप्ति होती है। परन्तु पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में असन्तोष रहता है। सातवीं मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु- पक्ष पर सफलता मिलती है। ऐसा व्यक्ति दूरदर्शी, विवेकी तथा बुद्धिमान् होता है। 'कन्या' लग्न में 'गुरु' 'कन्या' लग्न की कुंडली में 'प्रथमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कन्यालग्न : प्रथमभाव : बुध पहले भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक को श्रेष्ठ शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्य की प्राप्ति होती हैं। माता, भूमि तथा भवन का सुख भी मिलता है। पांचवीं नीचदृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के क्षेत्र में कठिनाइयां आती रहती हैं। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में सप्तमभाव को देखने से स्त्री एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सुख मिलता है। नवीं शत्रुदृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्योन्नति एवं धर्म के क्षेत्र में बाधाएं आती रहती हैं। परन्तु ऐसा व्यक्ति सज्जन तथा धनी होता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कन्यालग्न : द्वितीयभाव : बुध दूसरे भाव में सामान्य शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक को धन, कुटुम्ब का सुख मिलता है, परन्तु माता एवं स्त्री के सुख में कुछ बाधाएं आती हैं जबकि व्यवसाय-पक्ष की उन्नति होती है। पाँचवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टमभाव की देखने से शत्रु- पक्ष में प्रभाव स्थापित होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। नवीं मित्र- दृष्टि से एकादशभाव की देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में लाभ, यश तथा सम्मान की प्राप्ति होती है।