भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२२ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कन्या लग्न : षष्ठभाव : शुक्र छठे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक के भाग्य, धन तथा कौटुम्बिक सुख में कुछ कमी आती है तथा धर्म में भी अरुचि रहती है, फिर भी वह अपनी चतुराई द्वारा भाग्य तथा धन की वृद्धि करता है तथा परिश्रम द्वारा शत्रु-पक्ष में सफलताएँ पाता है। उसे झगड़े-मुकदमों से भी लाभ होता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी संबंधों से सुख एवं लाभ की प्राप्ति होती है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कन्या लग्न : सप्तमभाव : शुक्र सातवें भाव में सामान्य शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित उच्च के 'शुक्र' के प्रभाव से जातक की सुन्दर स्त्री मिलती है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलताएँ मिलती हैं। ऐसा व्यक्ति भोगी, धर्मात्मा, सुखी तथा भाग्यवान् होता है। सातवीं नीचदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य में कुछ कमी आती है। ऐसा व्यक्ति धन-वृद्धि के लिए शारीरिक सुखों की चिन्ता नहीं करता। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कन्या लग्न : अष्टमभाव : शुक्र आठवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक का भाग्य कमजोर रहता है तथा धन-संचय में भी कठिनाइयाँ आती हैं। धर्म का समुचित पालन भी नहीं हो पाता। पर आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। सातवीं नीच दृष्टि से स्वराशि वाले द्वितीय भाव को देखने से जातक गुप्त चातुर्य एवं कठोर परिश्रम द्वारा धन-संचय करता है।