भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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३२३ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कन्या लग्न : नवमभाव : शुक्र नवें भाव में स्वराशि-स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक बडा भाग्यशाली तथा धर्मात्मा होता है। उसके धन, सम्मान तथा यश में भी वृद्धि होती है। सातवीं सामान्य मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिनों की शक्ति तथा पुरुषार्थ में वृद्धि होती है। साथ ही धन एव कुटुम्ब का पूर्ण सुख भी मिलता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कन्या लग्न : दशमभाव दसवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित शुक्र' के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा 'व्यवसाय के क्षेत्र में विशेष सुख, सम्मान तथा सफलताएँ प्राप्त होती हैं। वह अपने अच्छे कर्मों से धन एव कुटुम्ब की वृद्धि करता है। सातवीं सामान्य शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन आदि का सुख कुछ कमी के साथ प्राप्त होता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कन्या लग्न : एकादशभाव : शुक्र ग्यारहवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक की आमदनी अच्छी रहती है। वह धनी, कुटुम्बवाला, धर्मात्मा, भाग्यशाली तथा न्यायी होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से पंचमभाव को देखने के कारण विद्या-बुद्धि की उन्नति होती है तथा सन्तान-पक्ष से सुख मिलता है। ऐसा व्यक्ति प्रभावयुक्त वाणी का धनी, चतुर, निपुण, सुखी तथा यशस्वी होता है।