भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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३४५ 'तुला' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश तुला लग्न : नवमभाव : सूर्य नवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक के धर्म तथा भाग्य की वृद्धि होती रहती है। उसे धन तथा सुख पर्याप्त मिलता है। सातवीं मित्रदृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में भी वृद्धि होती है। 'तुला' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश तुला लग्न : दशमभाव : सूर्य दसवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सुख, सम्मान तथा सफलता की प्राप्ति होती है। आमदनी में खूब वृद्धि होती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन के सुख में कुछ कमी बनी रहती है। 'तुला' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश तुला लग्न : एकादशभाव : सूर्य ग्यारहवें भाव में स्वराशि-स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक की आमदनी में बहुत वृद्धि होती रहती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से पंचम भाव को देखने से सन्तान के पक्ष से कुछ असन्तोष रहता है तथा विद्याध्ययन में भी कमी रहती है। ऐसे व्यक्ति की वाणी में तेजी पाई जाती है।