भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४६ 'तुला' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश तुला लग्न : द्वादशभाव : सूर्य बारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से सुख, सफलता एवं लाभ की प्राप्ति होती है । सातवीं मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष से मित्रता स्थापित होती है, झगड़ों से लाभ होता है तथा प्रभाव की वृद्धि होती है । 'तुला' लग्न में 'चन्द्रमा' 'तुला' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश तुला लग्न : प्रथमभाव : चन्द्र पहले भाव में सामान्य मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को शारीरिक सौन्दर्य, स्वास्थ्य एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व की प्राप्ति होती है। उसे राजनीति के क्षेत्र में सम्मान मिलता है। सातवीं मित्रदृष्टि से सप्तम भाव को देखने से सुन्दर स्त्री मिलती है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी लाभ होता है । 'तुला' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश तुला लग्न : द्वितीयभाव : चन्द्र दूसरे भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित नीच के 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब के सुख में कमी का सामना करना पड़ता है । धन-संचय के लिए गुप्त युक्तियों का सहारा भी लेना पड़ता है । सातवीं उच्चदृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु एवं पुरातत्त्व का लाभ होता है ।