भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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३४७ 'तुला' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश तुला लग्न : तृतीयभाव : चन्द्र तीसरे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को भाई-बहिनों का सुख मिलता है तथा पराक्रम में वृद्धि होती है । पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलता मिलती है तथा पुरातत्त्व का भी लाभ होता है । सातवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव को देखने से जातक के धर्म तथा भाग्य की वृद्धि होती है । ऐसा व्यक्ति बड़ा साहसी होता है । 'तुला' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश तुला लग्न : चतुर्थभाव : चन्द्र चौथे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक की माता, भूमि तथा भवन का त्रुटिपूर्ण लाभ होता है । सातवीं मित्रदृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सुख, सहयोग सफलता एवं सम्मान की प्राप्ति होती है । 'तुला' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश तुला लग्न : पंचमभाव : चन्द्र पाँचवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को सन्तान, विद्या तथा बुद्धि के क्षेत्र में सफलता मिलती है । राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी लाभ होता है । ऐसा व्यक्ति बड़ी तीक्ष्ण बुद्धि वाला होता है । सातवीं मित्रदृष्टि से एकादश भाव को देखने से आमदनी में पर्याप्त वृद्धि होती है तथा जातक धनी होता है ।

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