भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५० 'तुला' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश तुलालग्न : द्वादशभाव : चन्द्र बारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक होता है, परन्तु बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ एवं उन्नति भी होती है। पिता, व्यवसाय तथा राज्य-पक्ष में कुछ हानि उठानी पड़ती है। प्रतिष्ठा-मान में भी कमी रहती है। सातवीं मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु- पक्ष में शक्ति एवं चातुर्य द्वारा सफलता प्राप्त होती है। 'तुला' लग्न में मंगल 'तुला' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश तुलालग्न : प्रथमभाव : मंगल पहले भाव में सामान्य मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक की शारीरिक सुख तथा प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है। धन तथा कुटुम्ब का सुख भी मिलता है। चौथी उच्च दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का विशेष सुख मिलता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में सप्तमभाव को देखने से स्त्री का सुख मिलता है तथा व्यवसाय में उन्नति होती है। आठवीं सामान्य मित्रदृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की वृद्धि होती है, परन्तु उदर-विकार रहता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित मंगल का फलादेश तुलालग्न : द्वितीयभाव : मंगल दूसरे भाव में स्वराशि-स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब का सुख प्राप्त होता है। चौथी शत्रु-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से सन्तान तथा विद्या-बुद्धि का लाभ कुछ कठिनाइयों के साथ होता है। सातवीं सामान्य मित्र-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति प्राप्त होती है। आठवीं मित्रदृष्टि के नवम भाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की वृद्धि होती है।