भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६१ 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश तुला लग्न : नवमभाव : गुरु नवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक के भाग्य एवं धर्म की वृद्धि होती है तथा वह यशस्वी भी होता है। शत्रु-पक्ष अथवा अन्य झगड़ों के कारण भाग्योन्नति में कुछ कठिनाइयाँ भी आती हैं। पाँचवीं शत्रुदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शरीर में कुछ कमजोरी रहती है, परन्तु प्रभाव में वृद्धि होती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिनों के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। नवीं शत्रुदृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान से कुछ वैमनस्य रहता है, परन्तु विद्या एवं बुद्धि के क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश तुला लग्न : दशमभाव : गुरु दसवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सफलताएँ मिलती हैं। भाई-बहिन का सुख भी मिलता है, परन्तु कुछ मतभेद भी रहता है। पाँचवीं मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब का सुख मिलता है। सातवीं नीचदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन के सुख में कुछ कमी आती है। नवीं दृष्टि से स्वराशि में षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष में प्रभाव स्थापित होता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश तुला लग्न : एकादशभाव : गुरु ग्यारहवें भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक परिश्रम द्वारा अपनी आय तथा ऐश्वर्य को बढ़ाता है। उसे शत्रु-पक्ष से भी लाभ होता है। पाँचवीं मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को स्वराशि में देखने से भाई-बहिन का सुख मिलता है तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या तथा संतान के क्षेत्र में कुछ कमी रहती है। परन्तु बुद्धि अधिक होती है। नवीं मित्रदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता मिलती है।