भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६० 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश तुला लग्न : षष्ठभाव : गुरु छठे भाव में स्वराशिस्थ 'गुरु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष में प्रभाव स्थापित करता है। भाई-बहिनों से कुछ वैमनस्य रहता है तथा पुरुषार्थ में भी कुछ कमी रहती है। पाँचवीं उच्च-दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, व्यवसाय एवं राज्य के क्षेत्र में यथेष्ट सम्मान तथा सफलता की प्राप्ति होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है, परन्तु बाहरी स्थानों से लाभ होता है। नवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन की वृद्धि होती है, परन्तु कुटुम्ब से कुछ मतभेद बना रहता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश तुला लग्न : सप्तमभाव : गुरु सातवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक पुरुषार्थ द्वारा व्यवसाय की उन्नति करता है तथा स्त्री की शक्ति भी पाता है, परन्तु स्त्री से कुछ मतभेद रहता है। पाँचवीं मित्र- दृष्टि से एकादशभाव को देखने से पुरुषार्थ द्वारा यथेष्ट धनोपार्जन होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शरीर में कुछ परेशानियां रहती हैं, परन्तु प्रभाव की वृद्धि होती है। नवीं दृष्टि से स्वराशि के तृतीयभाव को देखने के कारण भाई-बहिन का सुख कुछ कमी के साथ मिलता है, परन्तु पराक्रम में वृद्धि होती है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश तुला लग्नः अष्टमभावः गुरु आठवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक के पुरातत्त्व एवं आयु की वृद्धि होती है। परन्तु भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में कमी आती है। शत्रु-पक्ष में भी परेशानी रहती है। पाँचवीं मित्रदृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों से लाभ होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब के सुख की वृद्धि होती है। नवीं नीचदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन के सुख में कुछ कमी रहती है।