भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६४ 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश तुला लग्न : षष्ठभाव : शुक्र छठे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित उच्च के 'शुक्र' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर विशेष प्रभाव रखता है तथा बड़ी-बड़ी कठिनाइयों पर भी विजय पा लेता है। उसे आयु तथा पुरातत्त्व का सामान्य लाभ भी होता है। सातवीं नीचदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च तथा बाहरी सम्बन्धों के कारण कुछ परेशानी रहती है। ऐसा व्यक्ति ठाठ-बाट का जीवन बिताता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश तुलालग्न : सप्तमभाव : शुक्र सातवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को स्त्री के पक्ष में कुछ कठिनाइयों के रहते हुए भी उनसे शक्ति प्राप्त होती है तथा शारीरिक परिश्रम द्वारा दैनिक व्यवसाय में भी सफलता मिलती है और आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ भी होता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशिस्थ प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य, आत्म-बल एवं प्रभाव की प्राप्ति भी होती है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश तुला लग्न : अष्टमभाव : शुक्र आठवें भाव में स्वराशि-स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को आयु एवं पुरातत्त्व का लाभ होता है, परन्तु शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्य में कुछ कमी आती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से जातक को धन-संचय के लिए चतुराई का सहारा लेना पड़ता है तथा कुटुम्बियों से उसका कुछ मतभेद बना रहता है।