भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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३६५ 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश तुला लग्न : नवमभाव : शुक्र नवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक के भाग्य एवं धर्म की उन्नति कुछ कमी के साथ होती है। उसे आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति भी प्राप्त होती है। शारीरिक सौन्दर्य एवं शील भी मिलता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से पराक्रम में तो वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों से सामान्य मतभेद बना रहता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश तुला लग्न : दशमभाव : शुक्र दसवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है। सफलता का मूल कारण चातुर्य एवं शारीरिक श्रम होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन का सुख यथेष्ट प्राप्त होता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश तुला लग्न : एकादशभाव : शुक्र ग्यारहवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक शारीरिक श्रम तथा चातुर्य के द्वारा पर्याप्त लाभ कमाता है। उसे आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति भी मिलती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान-पक्ष में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है, परन्तु विद्या-बुद्धि तथा वाणी की शक्ति में पर्याप्त वृद्धि होती है।