भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 357, कुल 638 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 357

३६६ 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश तुलालग्नः द्वादशभावः शुक्र बारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित नीच के 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को खर्च के बारे में कठिनाइयाँ उठानी पड़ती हैं तथा बाहरी सम्बन्धों से भी कष्ट होता है। आयु, पुरातत्त्व तथा शारीरिक क्षेत्र में भी कुछ कमी रहती है। सातवीं उच्च-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु पक्ष पर विशेष प्रभाव रहता है तथा झगड़े-झंझटों में हिम्मत तथा चतुराई से सफलता मिलती है। 'तुला' लग्न में 'शनि' 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश 'तुलालग्नः प्रथमभावः शनि पहले भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक स्थूल शरीर का तथा प्रभाव शाली होता है। उसे माता, भूमि, भवन, सन्तान तथा विद्या का सुख भी उत्तम रहता है। तीसरी शत्रुदृष्टि से तीसरे भाव को देखने से भाई-बहिनों से कुछ वैमनस्य रहता है तथा पराक्रम भी कठिनाई से ही बढ़ पाता है। सातवीं नीच-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री से कुछ मतभेद रहता है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयां आती हैं। दसवीं शत्रुदृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता के सुख में कमी रहती है, परन्तु व्यवसाय तथा राज्य के क्षेत्र में सफलता मिलती है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश तुलालग्न : द्वितीयभाव : शनि दूसरे भाव में 'शत्रु' 'मंगल' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को धन-संचय में कुछ कठिनाइयाँ आती हैं तथा कुटुम्बियों से कुछ मत- भेद रहता है। सन्तान के पक्ष में कमी तथा विद्या-बुद्धि के पक्ष में लाभ होता है। तीसरी दृष्टि से स्वराशि में चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का यथेष्ट सुख प्राप्त होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु एवं पुरातत्त्व का लाभ होता है। दसवीं शत्रुदृष्टि से एकादशभाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ आम- दनी अच्छी रहती है।