भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६७ 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश तुलालग्न : तृतीयभाव : शनि तीसरे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में विशेष वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों से कुछ मतभेद रहता है। माता द्वारा भी शक्ति मिलती है। तीसरी दृष्टि से स्वराशि में पंचमभाव को देखने से विद्या तथा सन्तान की यथेष्ट शक्ति प्राप्त होती है, परन्तु सन्तान से कुछ मतभेद भी रहता है। सातवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव को देखने से धर्म तथा भाग्य की वृद्धि होती है। दसवीं मित्रदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरीस्थानों से लाभ मिलता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली से 'चतुर्थभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश तुलालग्न : चतुर्थभाव : शनि चौथे भाव में स्वक्षेत्री शनि के प्रभाव से जातक को माता, भूमि एवं भवन का श्रेष्ठ सुख मिलता है। सन्तान तथा विद्या के क्षेत्र में भी सफलता मिलती है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर विशेष प्रभाव रहता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता से मतभेद रहते हुए भी सुख मिलता है तथा राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलता मिलती है। दसवीं उच्च-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्य में वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति सुखी, यशस्वी, मानी तथा प्रभावशाली होता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश तुलालग्न : पंचमभाव : शनि पाँचवें भाव में स्वराशि-स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को सन्तान, विद्या तथा बुद्धि के क्षेत्र में सफलता मिलती है। माता, भूमि तथा भवन का सुख भी मिलता है। तीसरी नीचदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्रीसे मतभेद रहता है तथा दैनिक व्यवसाय में कठिनाइयाँ आती हैं। सातवीं शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी के क्षेत्र में कठिनाइयों के बाद सफलता मिलती है। दसवीं शत्रुदृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से धन-संचय में भी कठिनाइयाँ आती हैं तथा कुटुम्ब से मतभेद बना रहता है।