भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६८ 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश तुलालग्न : षष्ठभाव : शनि उसे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को बुद्धि-बल द्वारा शत्रु-पक्ष में सफलता मिलती है। माता, भूमि तथा भवन के सुख एवं विद्या तथा सन्तान के क्षेत्र में सफलता भी कुछ कठिनाइयों के बाद प्राप्त होती है। तीसरी मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति में वृद्धि होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है। दसवीं शत्रुदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिनों से कुछ वैमनस्य रहता है, परन्तु पुरुषार्थ की वृद्धि होती है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश तुलालग्न : सप्तमभाव : शनि सातवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित नीच के शनि के प्रभाव से जातक को स्त्री, गृहस्थी तथा व्यवसाय के पक्ष में कुछ कठिनाई और अशान्ति का सामना करना पड़ता है। विद्या तथा सन्तान का पक्ष भी कमजोर रहता है। तीसरी मित्र- दृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की वृद्धि होती है। सातवीं उच्च दृष्टि से प्रथम भाव को देखने से जातक के शरीर का कद लम्बा होता है तथा उसे शारीरिक सुख भी मिलता है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि में चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का सुख कठिन परिश्रम द्वारा प्राप्त होता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश तुलालग्न : अष्टमभाव : शनि आठवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को आयु तथा पुरातत्त्व का अच्छा लाभ होता है। माता, भूमि, भवन, सन्तान तथा विद्या के पक्ष में कमी आती है। तीसरी शत्रुदृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन-संचय में कमी रहती है तथा कौटुम्बिक सुख में भी व्यवधान पड़ता है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि में पंचमभाव को देखने विद्यासे एवं सन्तान का सामान्य साथ होता है।