भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६६ 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश तुला लग्न : नवमभाव : शनि नवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक बुद्धि द्वारा भाग्योन्नति करता है तथा धर्म का पालन भी करता है । विद्या, सन्तान, भूमि, भवन एवं माता का सुख भी अच्छा मिलता है । तीसरी शत्रुदृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी के मार्ग में रुकावटें आती हैं । सातवीं शत्रुदृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिनों से मतभेद रहता है, परन्तु पराक्रम की वृद्धि होती है । दसवीं शत्रुदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से बुद्धि-बल द्वारा शत्रु-पक्ष पर विजय प्राप्त होती है । 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'सूर्य' (शनि) का फलादेश तुला लग्न : दशमभाव : शनि दसवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता मिलती है । वह स्वयं विद्वान् होता है, परन्तु सन्तान से मतभेद बना रहता है। तीसरी मित्रदृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है । सातवीं दृष्टि से स्वराशि के चतुर्थभाव में देखने से माता, भूमि एवं भवन का सुख भी मिलता है। दसवीं नीच दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री के सुख में कुछ कमी रहती है तथा व्यवसाय में भी कठिनाइयाँ आती रहती हैं । 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश तुला लग्न : एकादशभाव : शनि ग्यारहवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक की आमदनी कुछ कठिनाइयों के साथ खूब होती है । माता, भूमि तथा भवन आदि का भी यथेष्ट सुख मिलता है । तीसरी उच्च तथा मित्रदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक शक्ति एवं प्रभाव में वृद्धि होती है । सातवीं दृष्टि से स्वराशि में पंचमभाव को देखने से विद्या, बुद्धि एवं सन्तान-पक्ष में सफलता प्राप्त होती है । दसवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति बढ़ती है । ऐसा व्यक्ति मनमोजी, लापरवाह तथा स्वार्थी स्वभाव का होता है।