भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७० 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश तुला लग्न : द्वादशभाव : शनि बारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा उसे बाहरी संबंधों से लाभ होता है। माता, भूमि तथा भवन के सुख में कमी रहती है। तीसरी शत्रुदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन के संचय में कमी आती है तथा कुटुम्ब से मतभेद रहता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर सामान्य प्रभाव बना रहता है। दसवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव को देखने से धर्म तथा भाग्य की वृद्धि होती है। ऐसे व्यक्ति की बुद्धि तथा वाणी कुछ भ्रम-युक्त भी बनी रहती है। 'तुला' लग्न में 'राहु' 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश तुला लग्न : प्रथमभाव : राहु पहले भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक का शरीर दुर्बल होता है। वह परेशान भी रहता है। वह अपनी उन्नति के लिए गुप्त चातुर्य का आश्रय लेता है तथा कठिन परिश्रम करता है। कभी-कभी उसे बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, परन्तु अपनी सूझ-बूझ से उन पर विजय भी पा लेता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश तुला लग्न : द्वितीयभाव : राहु दूसरे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को धन के संग्रह करने में बड़ी कठिनाइयां आती हैं। कभी आकस्मिक रूप से धन-प्राप्ति होती है तो कभी घोर आर्थिक संकट भी आते हैं। वह गुप्त युक्तियों का आश्रय लेकर किसी प्रकार अपना काम चलाता है। उसे कुटुम्बियों द्वारा भी कष्ट प्राप्त होता है।