भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७१ 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश तुला लग्न : तृतीयभाव : राहु तीसरे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में कमी आती है, परन्तु वह युक्तियों का आश्रय लेकर उसमें वृद्धि करता है तथा अनुचित मार्ग भी अपनाता है। उसे भाई-बहिनों से कष्ट मिलता है तथा जीवन में कभी-कभी अन्य प्रकार के घोर संकटों का सामना भी करना पड़ता है। चातुर्य, युक्ति और पुरुषार्थ के बल पर ही वह कठिनाइयों पर विजय प्राप्त कर पाता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश तुला लग्न : चतुर्थभाव : राहु चौथे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा भवन के सुख में कमी आती है, परन्तु गुप्त युक्तियों, साहस तथा दृढ़ता के बल पर वह संकटों का सामना करके धन पर विजय पा लेता है। उसका जीवन बड़ा संघर्षपूर्ण बना रहता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश तुला लग्न : पंचमभाव : राहु पाँचवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को सन्तान-पक्ष से कष्ट मिलता है तथा विद्याध्ययन में भी कठिनाइयां आती हैं। वह सदैव चिन्तित तथा परेशान बना रहता है। स्वार्थ-सिद्धि के लिए वह उचित-अनुचित का विचार नहीं करता तथा गुप्त युक्तियों से काम लेकर ऊपर से बड़ी दृढ़ता प्रदर्शित करता है।