भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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अंश तक उच्च का, मिथुन राशि के १५ अंश तक नीच का माना जाता है। इसके विपरीत कुछ विद्वानों की राय में केतु वृश्चिक राशि में उच्च का तथा वृष राशि में नीच का होता है। मकर राशि को केतु का मूलत्रिकोण माना जाता है।
ग्रहों के पद
नवग्रहों में सूर्य तथा चन्द्र को राजा, बुध को युवराज, मंगल को सेनापति, गुरु तथा शुक्र को मन्त्री एवं शनि को सेवक का पद दिया गया है। अस्तु, जिस जातक के ऊपर जिस ग्रह का जितना अधिक प्रभाव होता है, वह उसे अपने ही अनुरूप बनाने की चेष्टा करता है।
ग्रहों के ६ प्रकार के बल
ग्रहों के बल ६ प्रकार के कहे गये हैं, उन्हें निम्नानुसार समझ लेना चाहिए— (१) स्थान बल—उच्च, स्वग्रही, मित्रग्रही अथवा मूल त्रिकोणस्थ ग्रह को 'स्थान बली' माना जाता है। चन्द्र तथा शुक्र 'सम राशि' अर्थात् वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर एवं मीन राशि में स्थित होने पर तथा सूर्य, मंगल, गुरु, गुरु, शनि, राहु एवं केतु 'विषम राशि' अर्थात् मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु एवं कुम्भ में स्थित होने पर भी 'स्थान बली' कहे जाते हैं ।
स्थान-बल निरूपण चक्र
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| सू. \ शु. · च. / शु. · च. |
| मं. · बु. \ २ / १२ |
| गु. · श. \ सू. · मं. · बु. · गु. · श. / सू. |
| रा. · के. \ रा. · के. / मं. · बु. |
| ३ \ १ / गु. · श. |
| \ / रा. · के. |
| \ / ११ |
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| ४ \ / १० |
| शु. · च. \ / शु. · च. |
| \ ७ / |
| सू. · मं. \ सू. · मं. · बु./ सू. · मं. |
| बु. · गु. · श. \ गु. · श. · रा./ बु. · गु. · श.|
| रा. · के. \ के. / रा. · के. |
| ५ \ / ९ |
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| / \ |
| / \ |
| ६ / ८ \ ३७ |
| शु. · च. / शु. · च. \ |
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उक्त उदाहरण कुण्डली की भाँति ही अन्य कुण्डलियों में भी ग्रहों के स्थानबल के विषय में समझ लेना चाहिए।