भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८४ 'वृश्चिक' लग्न में 'केतु' का फलादेश १- 'वृश्चिक' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ६७५ से ६८६ के बीच देखना चाहिए। २. वृश्चिक' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'केतु'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ६७५ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ६७६ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ६७७ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ६७८ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ६७६ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ६८० (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ६८१ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ६८२ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ६८३ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ६८४ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ६८५ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ६८६ 'वृश्चिक' लग्न में 'सूर्य' वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश वृश्चिक लग्न : प्रथमभाव : सूर्य शरीर-स्थान में अपने मित्र मंगल की वृश्चिक राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक सौन्दर्य से युक्त, हृष्ट-पुष्ट, आत्माभिमानी, क्रोधी, प्रभावशाली और दबंग होता है। पिता, राज्य तथा व्यवसाय-पक्ष से जातक को सुख, सहयोग और सम्मान प्राप्त होता है। वह सुन्दर वस्त्रों तथा आभूषणों का शौकीन और यशस्वी होता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से शुक्र की राशि में सप्तमभाव को देखने से स्त्री से वैमनस्य रहता है तथा दैनिक व्यवसाय में कुछ कठिनाइयां आती हैं।
(कुण्डली विवरण: लग्न (प्रथम भाव) — वृश्चिक राशि (८), सूर्य; द्वितीय भाव — धनु (९); तृतीय भाव — मकर (१०); चतुर्थ भाव — कुम्भ (११); पञ्चम भाव — मीन (१२); षष्ठ भाव — मेष (१); सप्तम भाव — वृष (२); अष्टम भाव — मिथुन (३); नवम भाव — कर्क (४); दशम भाव — सिंह (५); एकादश भाव — कन्या (६); द्वादश भाव — तुला (७))