भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 383, कुल 638 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 383

३६२ 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'चन्द्र' का फलादेश वृश्चिक लग्न : एकादशभाव : चन्द्र ग्यारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को श्रेष्ठ लाभ होता रहता है। वह धर्मपरायण, भाग्यशाली, सुखी तथा यशस्वी होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से विद्या-बुद्धि एवं सन्तान का श्रेष्ठ लाभ होता है, वाणी में शक्ति रहती है तथा मनोबल बढ़ा-चढ़ा रहता है। 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'चन्द्र' का फलादेश वृश्चिक लग्न : द्वादशभाव : चन्द्र बारहवें भाव में सामान्य मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है, परन्तु उसकी पूर्ति के लिए किसी कठिनाई का अनुभव नहीं होता। बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से अत्यधिक लाभ होता है। स्वदेश में भाग्य कमजोर रहता है, परन्तु विदेश में तरक्की होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रु-पक्ष में शक्ति से काम निकालता है तथा भाग्य- बल से कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करता है। 'वृश्चिक' लग्न में 'मंगल' 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश वृश्चिक लग्न : प्रथमभाव : मंगल पहले भाव में स्वराशि में स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक को शारीरिक शक्ति में वृद्धि होती है तथा शत्रु-पक्ष में सफलता मिलती है। चौथी शत्रुदृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन के सुख में कुछ कमी रहती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है। आठवीं मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु एवं पुरातत्त्व की शक्ति में वृद्धि होती है।