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भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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४४ (५) चेष्टाबल—मकर से मिथुन तक (मकर, कुंभ, मीन, मेष, वृष और मिथुन) किसी भी राशि में स्थित सूर्य तथा चन्द्रमा चेष्टाबली होते हैं और मंगल, बुध, गुरु, शुक्र तथा शनि—ये पाँचों ग्रह चन्द्रमा के साथ रहने पर चेष्टाबली होते हैं । निम्नांकित उदाहरण कुण्डली में ग्रहों के 'चेष्टाबल' को प्रदर्शित किया गया है इसी भाँति अन्य कुण्डलियों में भी समझ लें । ग्रहों का चेष्टाबल निरूपण चक्र [कुण्डली चक्र: १ भाव: चं. सू., चं. मं. बु. गु. शु. श.; २ भाव: चं. सू.; ३ भाव: चं. सू.; ४ भाव; ५ भाव; ६ भाव; ७ भाव; ८ भाव; ९ भाव; १० भाव: चं. सू.; ११ भाव: चं. सू.; १२ भाव: चं. सू.] (६) दृग्बल—जन्मकुण्डली में जिन क्रूर (दुष्ट या पाप) ग्रहों के ऊपर शुभ ग्रहों की दृष्टि पड़ती है, वे उनकी शुभ दृष्टि को पाकर 'दृग्बली' हो जाते हैं । जैसे—किसी जातक की कुण्डली में शनि पंचम भाव में बैठा हो तथा बुध लग्न में बैठा हो तो क्रूर-ग्रह शनि के ऊपर शुभ ग्रह गुरु की पूर्ण दृष्टि पड़ने के कारण शनि दृग्बली हो जाएगा । किस ग्रह की दृष्टि किन-किन भावों पर पड़ती है इसका वर्णन आगे किया गया है । नीचे का उदाहरण कुण्डली में क्रूर-ग्रहों के ऊपर शुभ ग्रहों की दृष्टि को प्रदर्शित किया गया है। इसी के अनुसार अन्यत्र भी समझ लेना चाहिए ।

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