भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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४५ ग्रहों का दृग्बल निरूपण चक्र [कुण्डली चक्र: १ गुरु, २ चन्द्र, ४ मंगल, ५ शनि, ८ सूर्य, १० शुक्र] आवश्यक ज्ञातव्य—पूर्वोक्त ६ प्रकार के बलों में से किसी भी प्रकार के बल को प्राप्त बलवान ग्रह जिस भाव में बैठा होता है जातक को उस भाव का विशेष फल अपने स्वभावानुसार देता है। किसी भाव स्थित किसी भी ग्रह के फलाफल की यथार्थ जानकारी के लिए उस भाव में स्थित राशि तथा ग्रह के स्वभाव एवं बल आदि का समन्वय करके ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए। ग्रहों की दृष्टि ग्रहों की दृष्टियाँ चार प्रकार की मानी गई हैं— (१) एक पाद या एक चरण दृष्टि (चतुर्थांश दृष्टि)। (२) द्विपाद या दो चरण दृष्टि (अर्धांश दृष्टि)। (३) त्रिपाद या तीन चरण दृष्टि (तीन चौथाई दृष्टि)। (४) पूर्ण दृष्टि (सम्पूर्ण दृष्टि)। जन्मकुण्डली में जो ग्रह जिस भाव में बैठा होता है, उस भाव से तृतीय तथा दशम भाव को एकपाद दृष्टि से, पंचम तथा नवम भाव को द्विपाद दृष्टि से, चतुर्थ तथा अष्टम भाव को त्रिपाद दृष्टि से तथा सप्तम भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है। यह नियम सभी ग्रहों पर समान रूप से लागू होता है। परन्तु इन दृष्टियों के अतिरिक्त मंगल जिस भाव में बैठा होता है, वहाँ से सप्तम भाव के अतिरिक्त चतुर्थ तथा अष्टम भाव को भी पूर्ण दृष्टि से देखता है। इसी प्रकार गुरु जिस भाव में बैठा हो, वहाँ से सप्तम भाव के अतिरिक्त पंचम तथा नवम भाव को भी पूर्ण दृष्टि से देखता है एवं शनि जिस भाव में बैठा हो, वहाँ के सप्तम भाव के अतिरिक्त