भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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४६ तृतीय तथा दशम भाव को भी पूर्ण दृष्टि से देखता है। अपूर्ण दृष्टि को 'खण्ड दृष्टि' भी कहते हैं। राहु तथा केतु की दृष्टि अन्य ग्रहों के समान सीधी न पड़कर उल्टी पड़ती है। जैसे लग्न में बैठा हुआ मंगल तृतीय तथा दशम भाव को एक पाद दृष्टि से देखेगा तो लग्न में बैठे हुए राहु-केतु एकादश तथा चतुर्थ भाव को एक पाद दृष्टि से देखेंगे। आगे दी गई मेष राशि की उदाहरण कुण्डलियों में लग्न (प्रथम भाव) स्थित विभिन्न ग्रहों की विभिन्न भावों पर पड़ने वाली एक पाद, द्विपाद, त्रिपाद तथा पूर्ण दृष्टि को अलग-अलग प्रदर्शित किया गया है। इसी भाँति अन्यत्र भी समझ लेना चाहिए। 'सूर्य' की विभिन्न भावों पर दृष्टि [कुण्डली चक्र: लग्न (१) सूर्य; ३ भाव - एकपाद; ४ भाव - त्रिपाद; ५ भाव - द्विपाद; ७ भाव - पूर्ण; ८ भाव - त्रिपाद; ९ भाव - द्विपाद; १० भाव - एकपाद] टिप्पणी—जिस भाव में भी 'सूर्य' बैठा हो, उस भाव से उपर्युक्त आधार पर, उसकी खण्ड तथा पूर्ण दृष्टि के विषय में समझ लेना चाहिए।