भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०२ 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : पंचमभाव : गुरु पाँचवें भाव में स्वराशि-स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के क्षेत्र में विशेष सफलता प्राप्त करता है। धन तथा कुटुम्ब का सुख भी उसे मिलता है। पाँचवीं मित्र तथा उच्चदृष्टि से नवमभाव को देखने से धर्म तथा भाग्य की विशेष उन्नति होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी खूब रहती है। नवीं मित्रदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य, शक्ति, सम्मान, प्रतिष्ठा तथा यश की वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति बड़ा ऐश्वर्यशाली होता है। 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : षष्ठभाव : गुरु छठे भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष में बुद्धि- बल से सफलता पाता है तथा धन एवं कुटुम्ब के कारण झगड़ों में फंसता है। विद्या तथा सन्तान पक्ष कमजोर रहता है। पाँचवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के द्वारा लाभ, सुख, सम्मान आदि की प्राप्ति होती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों से लाभ होता है। नवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वितीयभाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब की वृद्धि होती है। कुटुम्ब से कुछ वैमनस्य भी रहता है। 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : सप्तमभाव : गुरु सातवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक की सामान्य मतभेदों के बावजूद स्त्री का श्रेष्ठ सुख प्राप्त होता है तथा व्यवसाय में सफलता मिलती है। पाँचवीं मित्रदृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी खूब रहती है। सातवीं मित्रदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य तथा प्रभाव की प्राप्ति होती है। नवीं नीचदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में कुछ कमी का अनुभव होता है।