भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०३ 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : अष्टमभाव : गुरु आठवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक की आयु तथा पुरातत्त्व का श्रेष्ठ लाभ होता है, परन्तु विद्या, बुद्धि, सन्तान, धन एवं कुटुम्ब के सुख में कमी रहती है। पाँचवीं शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से कुछ लाभ होता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वितीयभाव की देखने से धन तथा कौटुम्बिक सुख की वृद्धि होती है। नवीं शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव की देखने से माता, भूमि तथा भवन का सुख कुछ कठिनाइयों के साथ मिलता है। 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : नवमभाव : गुरु नवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित उच्च के 'गुरु' के प्रभाव से जातक के धर्म तथा भाग्य की वृद्धि होती है। धन तथा कुटुम्ब [