भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०४ 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : एकादशभाव : गुरु ग्यारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक की आमदनी में वृद्धि होती है। धन तथा कुटुम्ब का सुख भी मिलता है। पाँचवीं शत्रु तथा नीच दृष्टि से तृतीयभाव में देखने से भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में कमी आती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में पंचमभाव की देखने से विद्या, बुद्धि तथा सन्तान-पक्ष की विशेष उन्नति होती है। नवीं शत्रु-दृष्टि से सप्तमभाव की देखने से पत्नी के साथ कुछ वैमनस्य रहते हुए भी लाभ होता है तथा दैनिक व्यवसाय में भी कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है। 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : द्वादशभाव : गुरु बारहवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक होता है तथा बाहरी सम्बन्ध भी कमजोर रहते हैं। धन, कुटुम्ब, विद्या तथा सन्तान के क्षेत्र में भी कमी रहती है। पाँचवीं शत्रु-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन के सुख में कमी रहती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठभाव की देखने से शत्रु- पक्ष में चतुराई से सफलता प्राप्त होती है। नवीं मित्र दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की अच्छी शक्ति प्राप्त होती है। ऐसी ग्रह-स्थिति वाले जातक का चित्त प्रायः अशान्त ही बना रहता है। 'वृश्चिक' लग्न में 'शुक्र' 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश वृश्चिक लग्न : प्रथमभाव : शुक्र पहले भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक का शरीर कमजोर रहता है, परन्तु प्रभाव, चातुर्य एवं कार्य-कुशलता में वृद्धि होती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में सप्तमभाव को देखने से स्त्री का सुख मिलता है तथा दैनिक व्यवसाय में भी सफलता प्राप्त होती रहती है, परन्तु शुक्र के व्ययेश होने के कारण इन क्षेत्रों में सामान्य कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ता है।