भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
DevanagariHindipublished638 पृष्ठ
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४०५ 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश वृश्चिक लग्न : द्वितीयभाव : शुक्र दूसरे भाव में सामान्य शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक के धन तथा कौटुम्बिक सुख में कुछ परेशानी रहती है यद्यपि धन का लाभ भी होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु में वृद्धि होती है, परन्तु पुरातत्त्व का लाभ कम रहता है। ऐसा व्यक्ति धनी तथा चतुर समझा जाता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश वृश्चिकलग्न : तृतीयभाव : शुक्र तीसरे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक की भाई-बहिन के सुख तथा पुरुषार्थ में कमी प्राप्त होती है। खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ भी होता है। स्त्री-पक्ष में भी कुछ कमी रहती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्योन्नति में कुछ कमी रहती है तथा धर्म का पालन भी थोड़ा ही होता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश वृश्चिक लग्न : चतुर्थभाव : शुक्र चौथे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक की माता, भूमि तथा भवन के सुख में कुछ कमी रहती है। स्त्री-पक्ष भी कमजोर रहता है। बाहरी सम्बन्धों से सुख प्राप्त होता है और खर्च आराम से चलता रहता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के बाद लाभ, सुख, यश एवं सफलता की प्राप्ति होती रहती है।