भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०७ 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश वृश्चिकलग्न : अष्टमभाव : शुक्र आठवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को आयु तथा पुरातत्त्व के क्षेत्र में संकटों तथा कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। यही स्थिति स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष में भी रहती है, परन्तु गुप्त चातुर्य एवं कठिन परिश्रम द्वारा सफलता प्राप्त होती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन-संचय तथा कौटुम्बिक सुख में भी कठिनाइयां आती हैं। बड़ी चतुराई से काम लेकर जातक किसी तरह अपनी इज्जत बचाता है। 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश वृश्चिकलग्न : नवमभाव : शुक्र नवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति तथा धर्म-पालन के क्षेत्र में कठिनाइयां आती हैं। स्त्री-पक्ष से भी परेशानी रहती है। वह बड़ी चतु- राई से काम निकालता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ उठाता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिन एवं पराक्रम के क्षेत्र में भी असन्तोष- जनक स्थिति बनी रहती है। 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश वृश्चिकलग्न : दशमभाव : सुख दसवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है। स्त्री तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में भी कमी बनी रहती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का सुख-सहयोग प्राप्त होता है।