भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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४०८ 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश वृश्चिकलग्न : एकादशभाव : शुक्र ग्यारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित नीच के 'शुक्र' के प्रभाव से जातक की आमदनी में कमी आती है। स्त्री तथा दैनिक व्यवसाय का क्षेत्र भी असन्तोषजनक रहता है। बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से चातुर्य द्वारा कुछ लाभ भी मिलता है। सातवीं उच्च तथा शत्रु दृष्टि से पञ्चमभाव को देखने से विद्या-बुद्धि की शक्ति प्राप्त होती है, परन्तु सन्तान-पक्ष में कुछ कमजोरी बनी रहती है। 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली से 'द्वादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश वृश्चिकलग्न : द्वादशभाव : शुक्र बारहवें भाव में स्वराशि-स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ मिलता है। स्त्री तथा दैनिक व्यवसाय के पक्ष में भी कुछ परेशानियां रहती हैं। सातवीं शत्रु-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष में भी कुछ परेशानियों के बाद ही सफलता प्राप्त होती है। 'वृश्चिक' लग्न में 'शनि' 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश वृश्चिकलग्न : प्रथमभाव : शनि पहले भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक का स्वभाव शान्त तथा उग्र दोनों प्रकार का होता है। माता, भूमि तथा भवन का सामान्य सुख मिलता है। तीसरी दृष्टि से स्वराशि में तृतीयभाव को देखने से पराक्रम में वृद्धि होती है तथा भाई-बहिन का सुख प्राप्त होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता मिलती है। दसवीं शत्रु-दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता से वैमनस्य रहता है तथा राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयों के बाद ही सफलता मिलती है।