भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१२ 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश वृश्चिकलग्न : एकादशभाव : शनि ग्यारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक की आमदनी में अच्छी वृद्धि होती है। भाई-बहिन, माता, भूमि तथा भवन का श्रेष्ठ सुख मिलता है तथा परा- क्रम भी बढ़ता है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य में कमी आती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से पंचमभाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ विद्या एवं सन्तान का लाभ होता है। दसवी मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से जातक दीर्घायु होता है तथा पुरातत्त्व का लाभ भी होता है। 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश वृश्चिकलग्न : द्वादशभाव : शनि बारहवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित उच्च के 'शनि' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से सुख एवं लाभ की प्राप्ति भी होती है। भाई-बहिन, माता तथा भवन के सुख में भी कुछ कमी आ जाती है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन- संचय तथा कौटुम्बिक सुख में कमी रहती है। सातवीं नीच-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रुपक्ष से परेशानी रहती है। दसवीं मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। ऐसा व्यक्ति अधिक धनी न होते हुए भी अमीरी ढंग से जीवन बिताता है। 'वृश्चिक' लग्न में 'राहु' 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृश्चिकलग्न : प्रथमभाव : राहु पहले भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक के शरीर में किसी गुप्त कष्ट अथवा चिन्ता का निवास रहता है। कभी- कभी उसे मृत्यु-तुल्य शारीरिक कष्ट भी होता है। वह उन्नति के लिए कठिन परिश्रम करता है तथा गुप्त युक्तियों का आश्रय लेता है। ऐसा व्यक्ति तेज स्वभाव का, स्वार्थी तथा असुन्दर होता है।