भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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४१४ 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : पंचमभाव : राहु पांचवें भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को विद्याध्ययन तथा सन्तान के पक्ष में कठिनाइयां आती हैं, बाद में कुछ सफलता भी मिलती है। ऐसा व्यक्ति चतुर, गुप्त युक्तियों में प्रवीण तथा हर समय चिन्तित रहने वाला होता है, परन्तु वह अपनी परेशानियों को किसी पर प्रकट नहीं करता। 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : षष्ठभाव : राहु छठे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक शत्रुओं पर अत्यधिक प्रभाव रखता है तथा उन पर विजयी होता है। ऐसा व्यक्ति गुप्त चातुर्य, धैर्य, हिम्मत, कठिन परिश्रम तथा युक्तियों के बल पर हर प्रकार की कठिना- इयों पर विजय पाता रहता है तथा कभी भी हिम्मत नहीं हारता। 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : सप्तमभाव : राहु सातवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक की स्त्री तथा व्यवसाय-पक्ष में कठिनाइयां आती हैं। कभी-कभी स्त्री अथवा व्यवसाय के कारण घोर संकटों में भी फंस जाना पड़ता है, परन्तु वह अपनी हिम्मत, युक्ति, चतुराई एवं धैर्य के बल पर उन सब कठिनाइयों को पार कर जाता है।