भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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४१५ 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : अष्टमभाव : राहु आठवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को पुरातत्त्व का लाभ होता है तथा आयु में वृद्धि होती है। उसका जीवन उमंग एवं उत्साह से भरा रहता है। वह बड़े ठाठ-बाट की जिंदगी बिताता है, परन्तु कभी-कभी उसे हानि भी उठानी पड़ती है। ऐसा व्यक्ति बड़ा यशस्वी भी होता है। 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : नवमभाव : राहु नवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को भाग्योन्नति में बहुत बाधाएँ आती हैं तथा धर्म के प्रति भी अश्रद्धा रहती है। वह मानसिक चिन्ताओं से ग्रस्त रहता है। कई बार निराश भी हो जाता है। अनेक प्रकार के कष्ट भोगने के बाद अन्त में उसे थोड़ी-बहुत सफलता मिलती है। 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : दशमभाव : राहु दसवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को अपने पिता द्वारा परेशानी रहती है तथा राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी कष्ट उठाने पड़ते हैं। कभी-कभी वह अत्यधिक निराश भी हो जाता है। अन्त में धैर्य, साहस एवं चातुर्य के बल पर किसी प्रकार उन संकटों पर विजय पाकर थोड़ी-बहुत उन्नति कर लेता है।