भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 407, कुल 638 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 407

४१६ 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : एकादशभाव : राहु ग्यारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक की आमदनी के क्षेत्र में खूब सफलता मिलती है। वह अधिक मुनाफा कमाने के लिए उचित-अनुचित का विचार भी नहीं करता। ऐसा व्यक्ति घोर स्वार्थी तथा चतुर होता है। कभी-कभी उसे आकस्मिक धन-लाभ होता है, तो कभी अचानक ही भारी घाटा भी चला जाता है। 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : द्वादशभाव : राहु बारहवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है, जिसके कारण उसे परेशानियां रहती हैं। बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से उसे कुछ कठिनाइयों के साथ लाभ भी होता है। कभी आकस्मिक धन-लाभ तो कभी आकस्मिक धन-हानि के अवसर भी उपस्थित होते हैं। अन्य प्रकार के कष्ट भी उठाने पड़ते हैं। 'वृश्चिक' लग्न में 'केतु' 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : प्रथमभाव : केतु पहले भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक के शरीर में कई बार चोट लगती है तथा शारीरिक सौन्दर्य में कमी आ जाती है। ऐसा व्यक्ति स्वभाव का उग्र, दिमाग का कमजोर तथा कठिन शारीरिक श्रम करने वाला होता है। उसके शरीर पर चोट आदि का कोई स्थायी चिन्ह भी बनता है।