भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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४१७ 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : द्वितीयभाव : केतु दूसरे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक धन-प्राप्ति के लिए प्रयत्न करता है। कभी-कभी आकस्मिक रूप से भी धन-लाभ हो जाता है। कौटुम्बिक सुख में कुछ कमी बनी रहती है। ऐसा व्यक्ति अपनी प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए सदैव सतर्क बना रहता है। ६७६


'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : तृतीयभाव : केतु तीसरे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में अत्यधिक वृद्धि होती है। भाई-बहिनों के संबंध के कष्ट का अनुभव होता है। झगड़े-झंझटों में उसे सफलता प्राप्त होती है। ऐसा व्यक्ति बड़ा साहसी, परिश्रमी, धैर्यवान् तथा हिम्मती होता है। ६७७


'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : चतुर्थभाव : केतु चौथे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की अपनी माता के कारण परेशानी उठानी पड़ती है। भूमि तथा भवन के सुख में भी कमी रहती है। चित्त सदैव अशान्त रहता है। कठिन परिश्रम के बाद उसे कुछ चैन मिलता है। स्थान बदल देने अर्थात् परदेश में रहने से कुछ सुख मिलता है। घर में उसे सदैव अशान्ति ही बनी रहती है। ६७८