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भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

४१७ 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : द्वितीयभाव : केतु दूसरे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक धन-प्राप्ति के लिए प्रयत्न करता है। कभी-कभी आकस्मिक रूप से भी धन-लाभ हो जाता है। कौटुम्बिक सुख में कुछ कमी बनी रहती है। ऐसा व्यक्ति अपनी प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए सदैव सतर्क बना रहता है। ६७६


'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : तृतीयभाव : केतु तीसरे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में अत्यधिक वृद्धि होती है। भाई-बहिनों के संबंध के कष्ट का अनुभव होता है। झगड़े-झंझटों में उसे सफलता प्राप्त होती है। ऐसा व्यक्ति बड़ा साहसी, परिश्रमी, धैर्यवान् तथा हिम्मती होता है। ६७७


'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : चतुर्थभाव : केतु चौथे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की अपनी माता के कारण परेशानी उठानी पड़ती है। भूमि तथा भवन के सुख में भी कमी रहती है। चित्त सदैव अशान्त रहता है। कठिन परिश्रम के बाद उसे कुछ चैन मिलता है। स्थान बदल देने अर्थात् परदेश में रहने से कुछ सुख मिलता है। घर में उसे सदैव अशान्ति ही बनी रहती है। ६७८

४१८ 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : पंचमभाव : केतु पाँचवें भाव में शत्रु 'बुध' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को विद्याध्ययन में कठिनाइयाँ आती हैं तथा सन्तान-पक्ष से भी कष्ट मिलता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा साहसी, दृढ़-निश्चयी, गुप्त युक्तियों से काम लेने वाला, धैर्यवान् तथा निडर होता है। वह अपनी गुप्त चिन्ताओं को किसी पर प्रकट नहीं होने देता । 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : षष्ठभाव : केतु छठे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर अपना विशेष प्रभाव रखता है। वह झगड़ों, कठिनाइयों आदि पर अपने साहस, गुप्त युक्ति, धैर्य, परिश्रम एवं बहादुरी के बल पर विजयपाता है। उसका ननिहाल-पक्ष कमजोर रहता है। 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : सप्तमभाव : केतु सातवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से घोर कष्ट मिलता है। गृहस्थ जीवन में अनेक संकट उठ खड़े होते हैं, दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में भी बड़ी कठिनाइयां आती हैं। ऐसा व्यक्ति अपनी गुप्त युक्तियों, धैर्य साहस आदि के बल पर संकटों का कुछ निवारण कर पाने में समर्थ हो जाता है।

४१६ 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : अष्टमभाव : केतु आठवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित नीच के 'केतु' के प्रभाव से जातक को अपने जीवन में अनेक बार मृत्यु-तुल्य कष्टों का सामना करना होता है। पुरातत्त्व की भी हानि होती है। ऐसा व्यक्ति जीवन-निर्वाह के लिए कठिन परिश्रम करता है तथा गुप्त युक्तियों का आश्रय लेता है परन्तु संकटों से मुक्ति नहीं मिल पाती। 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : नवमभाव : केतु नवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में बड़े संकट आते हैं तथा धर्म की हानि होती है। ऐसा व्यक्ति हर समय चिन्ताओं से घिरा रहता है। कभी-कभी घोर संकटों का सामना भी करता है। गुप्त युक्तियों एवं कठिन परिश्रम के बल पर भाग्य को बनाने की चेष्टा करते रहने पर भी सफलता नहीं मिल पाती। 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : दशमभाव : केतु दसवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को अपने पिता द्वारा कष्ट प्राप्त होता है। राज्य के क्षेत्र में मान- भंग होता है तथा व्यवसाय-क्षेत्र में घोर संकट आते रहते हैं। यद्यपि वह धैर्य, हिम्मत एवं गुप्त युक्तियों के आश्रय से अन्ततः थोड़ी-बहुत राहत भी प्राप्त कर लेता है, परन्तु उसका जीवन सुख से नहीं बीतता।

४२० 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : एकादशभाव : केतु ग्यारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की आमदनी अच्छी रहती है। कभी-कभी आकस्मिक धन का लाभ होता है तो कभी-कभी संकट भी आते हैं। ऐसा व्यक्ति चालाक, स्वार्थी, धूर्त तथा मतलबी होता है। उसे अपनी आमदनी से कभी सन्तोष नहीं होता। 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : द्वादशभाव : केतु बारहवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के संबंध से लाभ भी मिलता है। वह गुप्त युक्ति, चातुर्य तथा परिश्रम के बल पर अपने खर्च को चलाता है, परन्तु कभी-कभी उसे घोर संकटों का सामना भी करना पड़ता है। फिर भी वह अपने धैर्य को कभी नहीं छोड़ता।

४२१ 'धनु' लग्न

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|   १०   \      ९      /    ८   |
|         \ 'धनु' लग्न /        |
|   ११     \         /     ७    |
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|    \  १२  /       \   ६   /   |
|     \   /     ३     \   /     |
|  १   \ /             \ /  ५   |
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|        \      २      /        |
|         \           /         |
|          \    ४    /          |
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                             ६८७

['धनु' लग्न की कुण्डलियों के विभिन्न भावों में स्थित विभिन्न ग्रहों के फलादेश का पृथक्-पृथक् वर्णन]

'धनु' लग्न का फलादेश

'धनु' लग्न में लग्न लेने वाला जातक पिंगलवर्ण, बड़े दाँतों वाला घोड़े-जैसी जाँघों वाला तथा सुन्दर स्वरूप वाला होता है। वह अत्यन्त कार्य-कुशल, प्रतिभा- शाली, बुद्धिमान्, सतोगुणी, श्रेष्ठ स्वभाव वाला, सत्य-प्रतिज्ञ, पराक्रमी, तथा ऐश्वर्यवान् होता है। ऐसा व्यक्ति यात्रा-प्रेमी, व्यवसायी, ब्राह्मण तथा देवताओं का भक्त, प्रेम के वश में रहने वाला, मित्रों के काम आने वाला, अनेक कलाओं का जानकार अथवा कवि तथा लेखक होता है। उसे घोड़े पालने का शौक भी होता है। 'धनु' लग्न में जन्म लेने वाला जातक बाल्यावस्था में अधिक सुख भोगता है, मध्यमावस्था में सामान्य जीवन व्यतीत करता है तथा अन्तिमावस्था में धन-धान्य पूर्ण होता है। २२ अथवा २३ वर्ष की आयु में उसे धन का विशेष लाभ होता है।

४२२ 'धनु' लग्न वालों के अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित विभिन्न ग्रहों का स्थायी फलादेश आगे दी गई उदाहरण-कुण्डली संख्या ६८८ से १०६५ के बीच देखना चाहिए । गोचर-कुण्डली के ग्रहों का फलादेश किन उदाहरण-कुण्डलियों में देखें, इसे आगे लिखे अनुसार समझ लेना चाहिए । 'धनु' लग्न में 'सूर्य' का फलादेश १. 'धनु' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'सूर्य' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ६८८ से ६९९ के बीच देखना चाहिए । २. 'धनु' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'सूर्य' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'सूर्य'— (क) 'मेष' राशि पर ही तो संख्या ६८८ (ख) 'वृष' राशि पर ही तो संख्या ६८९ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ६९० (घ) 'कर्क' राशि पर ही तो संख्या ६९१ (च) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ६९२ (छ) 'कन्या' राशि पर ही तो संख्या ६९३ (छ) 'तुला' राशि पर ही तो संख्या ६९४ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ६९५ (झ) 'धनु' राशि पर ही तो संख्या ६९६ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ६९७ (ट) .'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ६९८ (ठ) 'मीन' राशि पर ही तो संख्या ६९९ 'धनु' लग्न में 'चन्द्रमा' का फलादेश १. 'धनु' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'चन्द्रमा' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १००० से १०११ के बीच देखना चाहिए। २. 'धनु' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित

४२३ 'चन्द्रमा' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस दिन 'चन्द्रमा'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १००० (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १००१ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १००२ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १००३ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १००४ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १००५ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १००६ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १००७ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १००८ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १००९ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १०१० (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या-१०११ 'धनु' लग्न में 'मंगल' का फलादेश १. 'धनु' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'मंगल' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १०१२ से १०२३ के बीच देखना चाहिए। २. 'धनु' लग्नवालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'मंगल' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'मंगल'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १०१२ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १०१३ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १०१४ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १०१५ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १०१६ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १०१७ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १०१८ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १०१९ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १०२० (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १०२१ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १०२२ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १०२३

४२४ 'धनु' लग्न में 'बुध' का फलादेश १. 'धनु' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'बुध' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १०२४ से १०३५ के बीच देखना चाहिए। २. 'धनु' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'बुध' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'बुध'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १०२४ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १०२५ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १०२६ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १०२७ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १०२८ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १०२९ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १०३० (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १०३१ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १०३२ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १०३३ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १०३४ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १०३५ 'धनु' लग्न में 'गुरु' का फलादेश १. 'धनु' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'गुरु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १०३६ से १०४७ के बीच देखना चाहिए। २. 'धनु' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'गुरु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'बुध'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १०३६ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १०३७ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १०३८ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १०३९ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १०४०

४२५ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १०४१ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १०४२ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १०४३ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १०४४ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १०४५ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १०४६ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १०४७ 'धनु' लग्न में 'शुक्र' का फलादेश १. 'धनु' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शुक्र' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १०४८ से १०५६ के बीच देखना चाहिए। 'धनु' लग्नवालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शुक्र' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'शुक्र'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १०४८ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १०४६ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १०५० (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १०५१ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १०५२ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १०५३ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १०५४ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १०५५ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १०५६ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १०५७ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १०५८ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १०५६ 'धनु' लग्न में 'शनि' का फलादेश १. 'धनु' लग्नवालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शनि' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ६२४ से ६३५ के बीच देखना चाहिए। २. 'धनु' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शनि'

४२६ का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में ‘शनि’— (क) ‘मेष’ राशि पर हो तो संख्या १०६० (ख) ‘वृष’ राशि पर हो तो संख्या १०६१ (ग) ‘मिथुन’ राशि पर हो तो संख्या १०६२ (घ) ‘कर्क’ राशि पर हो तो संख्या १०६३ (ङ) ‘सिंह’ राशि पर हो तो संख्या १०६४ (च) ‘कन्या’ राशि पर हो तो संख्या १०६५ (छ) ‘तुला’ राशि पर हो तो संख्या १०६६ (ज) ‘वृश्चिक’ राशि पर हो तो संख्या १०६७ (झ) ‘धनु’ राशि पर हो तो संख्या १०६८ (ञ) ‘मकर’ राशि पर हो तो संख्या १०६६ (ट) ‘कुम्भ’ राशि पर हो तो संख्या १०७० (ठ) ‘मीन’ राशि पर हो तो संख्या १०७१ ‘धनु’ लग्न में ‘राहु’ का फलादेश १ ‘धनु’ लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित ‘राहु’ का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १०७२ से १०८३ के बीच देखना चाहिए। २- ‘धनु’ लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित ‘राहु’ का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में ‘राहु’— (क) ‘मेष’ राशि पर हो तो संख्या १०७२ (ख) ‘वृष’ राशि पर हो तो संख्या १०७३ (ग) ‘मिथुन’ राशि पर हो तो संख्या १०७४ (घ) ‘कर्क’ राशि पर हो तो संख्या १०७५ (ङ) ‘सिंह’ राशि पर हो तो संख्या १०७६ (थ) ‘कन्या’ राशि पर हो तो संख्या १०७७ (छ) ‘तुला’ राशि पर हो तो संख्या १०७८ (ज) ‘वृश्चिक’ राशि पर हो तो संख्या १०७६ (झ) ‘धनु’ राशि पर हो तो संख्या १०८० (ञ) ‘मकर’ राशि पर हो तो संख्या १०८१ (ट) ‘कुम्भ’ राशि पर हो तो संख्या १०८२ (ठ) ‘मीन’ राशि पर हो तो संख्या १०८३

४२७ 'धनु' लग्न में 'केतु' का फलादेश १. 'धनु' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १०८४ से १०९५ के बीच देखना चाहिए। २. 'धनु' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित. 'केतु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'केतु'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १०८४ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १०८५ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १०८६ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १०८७ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १०८८ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १०८९ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १०९० (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १०९१ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १०९२ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १०९३ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १०९४ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १०९५ 'धनु' लग्न में सूर्य 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश धनु लग्न : प्रथमभाव : सूर्य [कुण्डली: लग्न (प्रथम भाव) में ९, सू०; द्वितीय भाव में १०; तृतीय भाव में ११; चतुर्थ भाव में १२; पंचम भाव में १; षष्ठ भाव में २; सप्तम भाव में ३; अष्टम भाव में ४; नवम भाव में ५; दशम भाव में ६; एकादश भाव में ७; द्वादश भाव में ८।] केन्द्र तथा शरीर-स्थान में अपने मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को उत्तम शक्तिशाली शरीर की प्राप्ति होती है। ऐसा व्यक्ति भाग्यशाली, धार्मिक रुचि वाला तथा आस्तिक होता है। सातवीं दृष्टि से बुध की राशि में सप्तमभाव को देखने से जातक को सुन्दर स्त्री का सहयोग और गृहस्थ-सुख प्राप्त होता है। साथ ही दैनिक व्यवसाय में लाभ भी होता है।

४२८ 'धनु' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश धनु लग्न : द्वितीयभाव : सूर्य दूसरे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को कुछ कठिनाइयों के साथ धन-संग्रह में श्रेष्ठ सफलता मिलती है तथा कुछ मत- भेदों के साथ कुटुम्ब का सुख भी प्राप्त होता है। ऐसा व्यक्ति स्वार्थ-सिद्धि के लिए धर्म का पालन करता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से जातक को आयु में वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का लाभ भी होता है। ऐसे व्यक्ति की भाग्योन्नति भी अच्छी होती है। 'धनु' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश धनु लग्न : तृतीयभाव : सूर्य तीसरे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को भाई-बहिनों का सुख कुछ असंतोष के साथ मिलता है तथा पराक्रम में अत्यधिक वृद्धि होती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में नवमभाव को देखने से पुरुषार्थ द्वारा भाग्य की अत्यधिक वृद्धि होती है, साथ ही धर्म का भी पालन होता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा हिम्मती तथा यशस्वी होता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश धनु लग्न : चतुर्थभाव : सूर्य चौथे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को माता का सुख अधिक मिलता है तथा भूमि, भवन का सुख भी प्राप्त होता है। धर्म तथा भाग्य की उन्नति भी होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सहयोग, सम्मान, लाभ तथा सफलता के अवसर भी प्राप्त होते रहते हैं।

४२६ 'धनु' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश धनु लग्न : पंचमभाव : सूर्य पाँचवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित उच्च के 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को सन्तान, विद्या एवं बुद्धि का यथेष्ट लाभ होता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा विद्वान्, धर्मात्मा, ज्ञानी तथा बुद्धिमान् होता है। सातवीं नीच-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी के क्षेत्र में कठिनाइयाँ आती हैं : वाणी में सुप्रखरता तथा शिष्टाचार एवं सज्जनता में कमी होने के कारण आर्थिक उन्नति अधिक नहीं होती। 'धनु' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश धनु लग्न : षष्ठभाव : सूर्य छठे भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर अत्यधिक प्रभाव रखता है तथा झगड़े के मामलों से लाभ उठाता है। धर्म-पालन में विशेष रुचि नहीं होती। बारहवें भाव में मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ मिलता है, जिसके कारण खर्च चलता है तथा भाग्य की वृद्धि भी होती है। 'धनु' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश धनु लग्न : सप्तमभाव : सूर्य सातवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से सुख मिलता है तथा दैनिक व्यवसाय में सफलताएँ मिलती रहती है। वह भाग्यशाली तथा ईश्वरभक्त भी होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से श्रेष्ठ शारीरिक सुख एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व की प्राप्ति होती है। ऐसे व्यक्ति की पत्नी कुछ तेज स्वभाव की होती है।

४३० 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश धनु लग्न : अष्टमभाव : सूर्य आठवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक की आयु में वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। दैनिक जीवन प्रभावपूर्ण रहता है, परन्तु भाग्योन्नति में अनेक रुकावटें आती हैं। सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन-संचय तथा कौटुम्बिक सुख के क्षेत्र में भी कुछ कमी रहती है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश धनु लग्न : नवमभाव : सूर्य नवें भाव में स्वराशि-स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक के भाग्य तथा धर्म की विशेष उन्नति होती है। वह बड़ा यशस्वी तथा प्रभावशाली होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से पराक्रम में कुछ कमी आती है तथा भाई-बहिनों के साथ कुछ मतभेद बना रहता है। ऐसा व्यक्ति भाग्य पर आश्रित रहने वाला होता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश धनु लग्न : दशमभाव : सूर्य दसवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को पिता द्वारा अत्यधिक सह- योग मिलता है तथा राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलताएँ प्राप्त होती हैं। ऐसा व्यक्ति बड़ा भाग्यवान् तथा धार्मिक विचारों का होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से जातक को माता, भूमि एवं भवन का यथेष्ट सुख मिलता है और यश तथा प्रतिष्ठा भी प्राप्त होती है।

४३१ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश धनु लग्न : एकादशभाव : सूर्य ग्यारहवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित नीच के सूर्य के प्रभाव से जातक की आमदनी में कुछ कठिनाइयों के साथ अच्छी वृद्धि होती है। सातवीं मित्र तथा उच्च दृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या, बुद्धि तथा सन्तान के क्षेत्र में भी पर्याप्त सफलता मिलती है। ऐसा व्यक्ति गुणी, विद्वान्, सज्जन, मधुरभाषी तथा सुखी होता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश धनु लग्न : द्वादशभाव : सूर्य बारहवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से कुछ विलम्ब के साथ सफ- लता मिलती है और लाभ होता है। धर्म-पालन में रुचि अधिक नहीं होती, परन्तु धर्म तथा परोपकार में ही अधिक खर्च होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रुओं पर प्रभाव बना रहता है तथा शत्रु-पक्ष, झगड़े, मुकदमे आदि से लाभ एवं विजय की प्राप्ति भी होती है। 'धनु' लग्न में 'चन्द्रमा' 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश धनु लग्न : प्रथमभाव : चन्द्र पहले भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित अष्टमेश 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को आयु में वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। शरीर सुन्दर तथा स्वस्थ होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के बाद स्त्री का सुख मिलता है तथा दैनिक आमदनी में भी जातक को कुछ कठिनाइयाँ आती रहती हैं।

४३२ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश धनुलग्न : द्वितीयभाव : चंद्र दूसरे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक धन का संचय नहीं कर पाता तथा कौटुम्बिक सुख में भी कमी बनी रहती है, परन्तु रहन-सहन अमीरी ढंग का होता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की वृद्धि होती है। मन में कुछ बेचैनी भी रहती है।

'धनु' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश धनुलग्न : तृतीयभाव : चंद्र तीसरे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'चंद्रमा' के प्रभाव से जातक को भाई-बहिन के सुख में कमी प्राप्त होती है तथा पराक्रम की वृद्धि के लिए विशेष प्रयत्न करना पड़ता है। आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से नवमभाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ भाग्य एवं धर्म की वृद्धि होती है। सामान्यतः जातक भाग्यशाली तथा संघर्ष- पूर्ण जीवन जीने वाला होता है।

'धनु' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश धनुलग्न : चतुर्थभाव : चंद्र चौथे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को माता के सुख में कुछ कमी रहती है। उसे मातृभूमि से दूर जाकर भी रहना पड़ता है। आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। दैनिक जीवन प्रभावशाली बना रहता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है।

४३३ ‘धनु’ लग्न की कुण्डली के ‘पंचमभाव’ स्थित ‘चंद्रमा’ का फलादेश धनु लग्न : पंचमभाव : चंद्र पाँचवें भाव में ‘मंगल’ की राशि पर स्थित अष्ट- मेश ‘चंद्रमा’ के प्रभाव से जातक की विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के क्षेत्र में कुछ कमियों का सामना करना पड़ता है। आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है, किन्तु मस्तिष्क में चिन्ताएं भी रहती हैं। सातवीं शत्रु-दृष्टि से एकादश भाव को देखने से आमदनी के क्षेत्र में भी बड़ी कठिनाइयों के बाद सामान्य सफलता मिलती है। ‘धनु’ लग्न की कुण्डली के ‘षष्ठभाव’ स्थित ‘चंद्रमा’ का फलादेश धनु लग्न : षष्ठभाव : चंद्र छठे भाव में शत्रु ‘शुक्र’ की राशि पर स्थित उच्च के ‘चंद्रमा’ के प्रभाव से जातक का शत्रु-पक्ष पर प्रभाव बना रहता है। आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ भी होता है। सातवीं नीच-दृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्चे की परेशानी रहती है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध भी अच्छे सिद्ध नहीं होते। ऐसे व्यक्ति को शत्रु-पक्ष के कारण कुछ मान- सिक परेशानियां भी रहती हैं। ‘धनु’ लग्न की कुण्डली के ‘सप्तमभाव’ स्थित ‘चंद्रमा’ का फलादेश धनु लग्न : सप्तमभाव : चंद्र सातवें भाव में मित्र ‘बुध’ की राशि पर स्थित अष्टमेश ‘चंद्रमा’ के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से कष्ट मिलता है तथा दैनिक व्यवसाय में भी कठिना- इयाँ आती हैं। आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है तथा दैनिक जीवन भी कुछ आनन्दमय बना रहता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य में वृद्धि होती है, परन्तु स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता। थोड़े परिश्रम से ही थक जाया करता है।

४३४ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'चंद्रमा' का फलादेश धनु लग्न : अष्टमभाव : चंद्र आठवें भाव में स्वराशि में स्थित 'चंद्रमा' के प्रभाव से जातक की आयु में वृद्धि होती है तथा पुरा- तत्त्व का यथेष्ट लाभ होता है। दैनिक जीवन बड़े ठाठ-बाट का रहता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीय भाव की देखने से धन के बारे में चिन्ताएं बनी रहती हैं तथा कौटुम्बिक सुख में भी कमी रहती है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश धनु लग्न : नवमभाव : चंद्र नवें भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'चंद्रमा' के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में कुछ परेशानियां आती हैं तथा यश भी कम मिल पाता है। धर्म का यथाविधि पालन नहीं होता। आयु तथा पुरा- तत्त्व में वृद्धि होती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिनों से मतभेद रहता है तथा पराक्रम में भी यथोचित वृद्धि नहीं हो पाती। जीवन सामान्य ढंग से व्यतीत होता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश धनु लग्न : दशमभाव : चंद्र दसवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'चंद्रमा' के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयां आती हैं, परन्तु आयु एवं पुरातत्त्व का लाभ होता है जिसके कारण जीवन ठाठ से बीतता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थ भाव की देखने से माता, भूमि एवं भवन का सुख कुछ कमी एवं परेशानी के साथ मिलता है।

४३५ धनु' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश धनु लग्न : एकादशभाव : चंद्र ग्यारहवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को कुछ परेशानियों के साथ लाभ होता है। आयु तथा पुरातत्त्व की श्रेष्ठ शक्ति प्राप्त होती है तथा दैनिक जीवन आनन्दपूर्ण बना रहता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से विद्या, बुद्धि एवं संतान के क्षेत्र में कुछ कमी रहती है तथा मस्तिष्क में चिन्ताएं घिरी रहती हैं। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश धनु लग्न : द्वादशभाव : चंद्र बारहवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित नीच के 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को खर्च के बारे में बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से कष्ट मिलता है। आयु तथा पुरातत्त्व की भी हानि होती है। दैनिक-जीवन अशान्तिपूर्ण रहता है। सातवीं उच्चदृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव स्थापित होता है तथा झगड़े- मुकदमों में सदैव विजय प्राप्त होती है। 'धनु' लग्न में 'मंगल' 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश धनु लग्न : प्रथमभाव : मंगल पहले भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक की शारीरिक शक्ति अच्छी रहती है तथा परिश्रमी भी होता है। विद्या, सन्तान तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है : चौथी मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि, भवन का सुख कुछ कमी के साथ मिलता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से कुछ कमी के साथ स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में लाभ होता है। आठवीं नीचदृष्टि से अष्टम- भाव को देखने से आयु एवं पुरातत्त्व का क्षेत्र कमजोर रहता है।

४३६ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश धनुलग्न : द्वितीयभाव : मंगल दूसरे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक धन का सामान्य संचय करता है तथा उसे कौटुम्बिक सुख कुछ कमी के साथ मिलता है। चौथी दृष्टि से स्वराशि में पंचम भाव को देखने से विद्या तथा सन्तान की शक्ति प्राप्त होती है ! सातवीं नीच-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व के क्षेत्र में कमी रहती है। आठवीं मित्र-दृष्टि से नवमभाव को देखने से बड़ी कठिनाइयों के साथ भाग्योन्नति में थोड़ी-बहुत सफलता मिलती है तथा धर्म का पालन भी कम ही हो पाता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश धनुलग्न : तृतीयभाव : मंगल तीसरे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में वृद्धि होती है तथा भाई-बहिन का सुख कुछ कमी के साथ मिलता है। विद्या तथा सन्तान-पक्ष भी कमजोर रहता है। चौथी शत्रु-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रु पक्ष पर विजय मिलती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से नवम भाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की उन्नति होती है। आठवीं मित्र- दृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में न्यूनाधिक सफलता मिलती रहती है। जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं ! 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश धनुलग्न : चतुर्थभाव : मंगल चौथे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से माता, भूमि तथा भवन के सुख की हानि होती है। सन्तान तथा विद्या का पक्ष भी कमजोर रहता है। चौथी मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों से काम चलता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कमी के साथ सफलता मिलती है। आठवीं शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से बुद्धियोग के आमदनी बढ़ती है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है !