भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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४२० 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : एकादशभाव : केतु ग्यारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की आमदनी अच्छी रहती है। कभी-कभी आकस्मिक धन का लाभ होता है तो कभी-कभी संकट भी आते हैं। ऐसा व्यक्ति चालाक, स्वार्थी, धूर्त तथा मतलबी होता है। उसे अपनी आमदनी से कभी सन्तोष नहीं होता। 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : द्वादशभाव : केतु बारहवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के संबंध से लाभ भी मिलता है। वह गुप्त युक्ति, चातुर्य तथा परिश्रम के बल पर अपने खर्च को चलाता है, परन्तु कभी-कभी उसे घोर संकटों का सामना भी करना पड़ता है। फिर भी वह अपने धैर्य को कभी नहीं छोड़ता।