भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
पृष्ठ 410, कुल 638 में से
संदर्भ में पढ़ें४१६ 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : अष्टमभाव : केतु आठवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित नीच के 'केतु' के प्रभाव से जातक को अपने जीवन में अनेक बार मृत्यु-तुल्य कष्टों का सामना करना होता है। पुरातत्त्व की भी हानि होती है। ऐसा व्यक्ति जीवन-निर्वाह के लिए कठिन परिश्रम करता है तथा गुप्त युक्तियों का आश्रय लेता है परन्तु संकटों से मुक्ति नहीं मिल पाती। 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : नवमभाव : केतु नवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में बड़े संकट आते हैं तथा धर्म की हानि होती है। ऐसा व्यक्ति हर समय चिन्ताओं से घिरा रहता है। कभी-कभी घोर संकटों का सामना भी करता है। गुप्त युक्तियों एवं कठिन परिश्रम के बल पर भाग्य को बनाने की चेष्टा करते रहने पर भी सफलता नहीं मिल पाती। 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : दशमभाव : केतु दसवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को अपने पिता द्वारा कष्ट प्राप्त होता है। राज्य के क्षेत्र में मान- भंग होता है तथा व्यवसाय-क्षेत्र में घोर संकट आते रहते हैं। यद्यपि वह धैर्य, हिम्मत एवं गुप्त युक्तियों के आश्रय से अन्ततः थोड़ी-बहुत राहत भी प्राप्त कर लेता है, परन्तु उसका जीवन सुख से नहीं बीतता।