भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२७ 'धनु' लग्न में 'केतु' का फलादेश १. 'धनु' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १०८४ से १०९५ के बीच देखना चाहिए। २. 'धनु' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित. 'केतु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'केतु'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १०८४ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १०८५ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १०८६ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १०८७ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १०८८ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १०८९ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १०९० (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १०९१ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १०९२ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १०९३ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १०९४ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १०९५ 'धनु' लग्न में सूर्य 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश धनु लग्न : प्रथमभाव : सूर्य [कुण्डली: लग्न (प्रथम भाव) में ९, सू०; द्वितीय भाव में १०; तृतीय भाव में ११; चतुर्थ भाव में १२; पंचम भाव में १; षष्ठ भाव में २; सप्तम भाव में ३; अष्टम भाव में ४; नवम भाव में ५; दशम भाव में ६; एकादश भाव में ७; द्वादश भाव में ८।] केन्द्र तथा शरीर-स्थान में अपने मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को उत्तम शक्तिशाली शरीर की प्राप्ति होती है। ऐसा व्यक्ति भाग्यशाली, धार्मिक रुचि वाला तथा आस्तिक होता है। सातवीं दृष्टि से बुध की राशि में सप्तमभाव को देखने से जातक को सुन्दर स्त्री का सहयोग और गृहस्थ-सुख प्राप्त होता है। साथ ही दैनिक व्यवसाय में लाभ भी होता है।