भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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४३५ धनु' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश धनु लग्न : एकादशभाव : चंद्र ग्यारहवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को कुछ परेशानियों के साथ लाभ होता है। आयु तथा पुरातत्त्व की श्रेष्ठ शक्ति प्राप्त होती है तथा दैनिक जीवन आनन्दपूर्ण बना रहता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से विद्या, बुद्धि एवं संतान के क्षेत्र में कुछ कमी रहती है तथा मस्तिष्क में चिन्ताएं घिरी रहती हैं। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश धनु लग्न : द्वादशभाव : चंद्र बारहवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित नीच के 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को खर्च के बारे में बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से कष्ट मिलता है। आयु तथा पुरातत्त्व की भी हानि होती है। दैनिक-जीवन अशान्तिपूर्ण रहता है। सातवीं उच्चदृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव स्थापित होता है तथा झगड़े- मुकदमों में सदैव विजय प्राप्त होती है। 'धनु' लग्न में 'मंगल' 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश धनु लग्न : प्रथमभाव : मंगल पहले भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक की शारीरिक शक्ति अच्छी रहती है तथा परिश्रमी भी होता है। विद्या, सन्तान तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है : चौथी मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि, भवन का सुख कुछ कमी के साथ मिलता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से कुछ कमी के साथ स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में लाभ होता है। आठवीं नीचदृष्टि से अष्टम- भाव को देखने से आयु एवं पुरातत्त्व का क्षेत्र कमजोर रहता है।