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भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

४३५ धनु' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश धनु लग्न : एकादशभाव : चंद्र ग्यारहवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को कुछ परेशानियों के साथ लाभ होता है। आयु तथा पुरातत्त्व की श्रेष्ठ शक्ति प्राप्त होती है तथा दैनिक जीवन आनन्दपूर्ण बना रहता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से विद्या, बुद्धि एवं संतान के क्षेत्र में कुछ कमी रहती है तथा मस्तिष्क में चिन्ताएं घिरी रहती हैं। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश धनु लग्न : द्वादशभाव : चंद्र बारहवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित नीच के 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को खर्च के बारे में बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से कष्ट मिलता है। आयु तथा पुरातत्त्व की भी हानि होती है। दैनिक-जीवन अशान्तिपूर्ण रहता है। सातवीं उच्चदृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव स्थापित होता है तथा झगड़े- मुकदमों में सदैव विजय प्राप्त होती है। 'धनु' लग्न में 'मंगल' 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश धनु लग्न : प्रथमभाव : मंगल पहले भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक की शारीरिक शक्ति अच्छी रहती है तथा परिश्रमी भी होता है। विद्या, सन्तान तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है : चौथी मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि, भवन का सुख कुछ कमी के साथ मिलता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से कुछ कमी के साथ स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में लाभ होता है। आठवीं नीचदृष्टि से अष्टम- भाव को देखने से आयु एवं पुरातत्त्व का क्षेत्र कमजोर रहता है।

४३६ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश धनुलग्न : द्वितीयभाव : मंगल दूसरे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक धन का सामान्य संचय करता है तथा उसे कौटुम्बिक सुख कुछ कमी के साथ मिलता है। चौथी दृष्टि से स्वराशि में पंचम भाव को देखने से विद्या तथा सन्तान की शक्ति प्राप्त होती है ! सातवीं नीच-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व के क्षेत्र में कमी रहती है। आठवीं मित्र-दृष्टि से नवमभाव को देखने से बड़ी कठिनाइयों के साथ भाग्योन्नति में थोड़ी-बहुत सफलता मिलती है तथा धर्म का पालन भी कम ही हो पाता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश धनुलग्न : तृतीयभाव : मंगल तीसरे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में वृद्धि होती है तथा भाई-बहिन का सुख कुछ कमी के साथ मिलता है। विद्या तथा सन्तान-पक्ष भी कमजोर रहता है। चौथी शत्रु-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रु पक्ष पर विजय मिलती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से नवम भाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की उन्नति होती है। आठवीं मित्र- दृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में न्यूनाधिक सफलता मिलती रहती है। जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं ! 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश धनुलग्न : चतुर्थभाव : मंगल चौथे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से माता, भूमि तथा भवन के सुख की हानि होती है। सन्तान तथा विद्या का पक्ष भी कमजोर रहता है। चौथी मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों से काम चलता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कमी के साथ सफलता मिलती है। आठवीं शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से बुद्धियोग के आमदनी बढ़ती है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है !

४३७ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश धनुलग्न:पंचमभाव: मंगल पाँचवें भाव में स्वराशि-स्थित व्ययेश 'मंगल' के प्रभाव से जातक को कुछ परेशानियों के बाद विद्या एवं संतान के क्षेत्र में कुछ सफलता मिलती है। चौथी नीच-दृष्टि से मित्र राशि में अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व में कमी रहती है तथा उदर-विकार बना रहता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से एकादश भाव को देखने से बुद्धियोग द्वारा आमदनी के क्षेत्र में कुछ सफलता मिलती है। आठवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है, परन्तु बाहरी स्थानों से विशेष लाभ भी होता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश धनुलग्न: षष्ठभाव: मंगल छठे भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक को शत्रु-पक्ष में सफलता मिलती है। परन्तु सन्तान तथा विद्या के क्षेत्र में कमी रहती है। चौथी मित्र-दृष्टि से नवम भाव को देखने से कुछ परेशानियों के साथ भाग्य एवं धर्म की वृद्धि होती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी संबंधों में कठिनाइयां आती हैं। आठवीं मित्र-दृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य तथा स्वास्थ्य में कमी तथा मस्तिष्क में परेशानी रहती है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश धनुलग्न: सप्तमभाव: मंगल सातवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से कष्ट मिलता है तथा व्यवसाय में हानि होती है। बाहरी स्थानों से कुछ अच्छा संबंध रहता है, जिसके बल पर खर्च चलता रहता है। चौथी मित्र-दृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सामान्य सफलता मिलती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शरीर में कुछ कमजोरी रहती है। आठवीं उच्च- दृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब का अच्छा सुख प्राप्त होता है।

४३८ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश धनुलग्न : अष्टमभाव : मंगल आठवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित नीच के 'मंगल' के प्रभाव से जातक की आयु तथा पुरातत्त्व शक्ति में कमी आती है। पेट में विकार तथा मस्तिष्क में चिन्ताएं रहती हैं। संतान पक्ष से कष्ट होता है तथा विद्या-पक्ष में कमजोरी रहती है। चौथी शत्रु-दृष्टि से एकादश भाव को देखने से कठिन परिश्रम द्वारा आमदनी में वृद्धि होती है। सातवीं उच्च-दृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से धन- कुटुम्ब का सामान्य सुख मिलता है। आठवीं शत्रु- दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से पराक्रम की वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों से विरोध रहता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश धनुलग्न : नवमभाव : मंगल नवें भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक के भाग्य तथा धर्म की उन्नति होती है। विद्या तथा सन्तान के क्षेत्र में भी कुछ कमी के साथ सफलता मिलती है। चौथी दृष्टि से स्वराशि में द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी संबन्धों से खर्च चलता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिनों से विरोध रहता है तथा पराक्रम में कमी आती है। आठवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का सुख कुछ कमी के भाव मिलता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश धनुलग्न : दशमभाव : मंगल दसवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक की राज्य के क्षेत्र में बुद्धियोग से सफलता मिलती है तथा पिता एवं व्यवसाय के क्षेत्र में हानि रहती है। चौथी मित्र-दृष्टि से प्रथम भाव को देखने के शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्य में कमी रहती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन का सुख कुछ कमी के साथ मिलता है। आठवीं दृष्टि से स्वराशि में पंचम भाव को देखने से विद्या, बुद्धि का श्रेष्ठ लाभ होता है, परन्तु सन्तान-पक्ष फिर भी कमजोर रहता है।

४३६ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'एकादश भाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश धनुलग्न : एकादश भाव : मंगल ग्यारहवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित [कुण्डली १०२२ : एकादश भाव में मं.] 'मंगल' के प्रभाव से जातक की आमदनी में पर्याप्त वृद्धि होती है। खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से कुछ कठिनाई के साथ लाभ होता है। चौथी उच्च दृष्टि से शत्रुराशि में द्वितीय भाव को देखने से धन- संचय के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ता है तथा कुटुम्ब का सुख प्राप्त होता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में पंचम भाव की देखने से विद्या एवं सन्तान पक्ष से लाभ होता है। आठवीं शत्रु-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव रहता है तथा झगड़ों में विजय एवं लाभ की प्राप्ति होती है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश धनुलग्न : द्वादशभाव : मंगल बारहवें भाव में स्वराशि में स्थित 'मंगल' के [कुण्डली १०२३ : द्वादश भाव में मं.] प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है! सन्तान तथा विद्या-पक्ष में कमी रहती है। चौथी शत्रु-दृष्टि से तृतीय भाव की देखने से भाई-बहिनों से विरोध रहता है, परन्तु पराक्रम की वृद्धि होती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से षष्ठ भाव की देखने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है तथा झगड़ों से लाभ होता है। आठवीं मित्र-दृष्टि से सप्तम भाव की देखने से स्त्री-पक्ष से कष्ट मिलता है तथा व्यवसाय में कठिनाइयां आती रहती हैं। 'धनु' लग्न में 'बुध' 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश धनुलग्न : प्रथमभाव : बुध पहले भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित [कुण्डली १०२४ : प्रथम भाव में बुं.] 'बुध' के प्रभाव से जातक को श्रेष्ठ शारीरिक तथा विवेकशक्ति प्राप्त होती है। पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलता मिलती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से स्वराशि में सप्तम भाव को देखने से सुन्दर पत्नी मिलती है तथा ससुराल से यथेष्ट धन भी प्राप्त होता है। दैनिक आमदनी भी बहुत अच्छी रहती है।

४४० 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश धनु लग्न : द्वितीयभाव : बुध दूसरे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब का विशेष सुख मिलता है। पिता, राज्य तथा व्यवसाय से भी लाभ होता है परन्तु स्त्री-सुख में कमी रहती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। दैनिक जीवन उल्लासपूर्ण एवं शानदार बना रहता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश धनु लग्न : तृतीयभाव : बुध तीसरे भाव में मित्र 'शनि की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक के पराक्रम की वृद्धि होती है तथा भाई-बहिनों का यथेष्ट सुख मिलता है। अपनी विवेक-बुद्धि से उसे प्रत्येक क्षेत्र में सफलता मिलती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से नवम भाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की वृद्धि होती रहती है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश धनु लग्न: चतुर्थभावः बुध चौथे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित नीच के 'बुध' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि एवं भवन के सुख में कमी प्राप्त होती है। स्त्री तथा गृहस्थी के सुख में भी कठिनाइयां आती हैं। सातवीं उच्च दृष्टि से स्वराशि में दशम भाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में शक्ति एवं सफलता प्राप्त होती है।

४४१ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश धनु लग्न : पंचमभाव : बुध पाँचवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक की विद्या, बुद्धि तथा सन्तान का श्रेष्ठ लाभ होता है। स्त्री, गृहस्थी, पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी उन्नति होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से एकादश भाव को देखने से आमदनी खूब होती है। ऐसा व्यक्ति वार्तालाप करने में बड़ा चतुर, बुद्धिमान तथा यशस्वी भी होता १०२८ है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश धनु लग्न : षष्ठभाव : बुध छठे भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक को शत्रु-पक्ष में सफलता मिलती है, परन्तु पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में हानि उठानी पड़ती है। नाना के पक्ष से लाभ होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा उसे बाहरी सम्बन्धों से लाभ १०२९ होता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश धनु लग्न : सप्तमभाव : बुध सातवें भाव में 'स्वराशि' स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक को सुन्दर स्त्री मिलती है तथा स्त्री-पक्ष से लाभ भी होता है। दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलता मिलती है। राज्य एवं विद्या से भी सहयोग तथा सम्मान मिलता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य तथा प्रभाव में वृद्धि होती है। १०३०

४४२ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'सुख' का फलादेश धनुलग्न : अष्टमभाव : बुध आठवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक की आयु तथा पुरा- तत्त्व की शक्ति प्राप्त होती है। परंतु पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कभी-कभी बड़े घाटे तथा कठिना- इयों का सामना करना होता है। सामान्य रहन-सहन शानदार रहता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीय भाव को देखने के धन तथा कुटुम्ब की वृद्धि के लिए विशेष परिश्रम करना पड़ता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश धनुलग्न : नवमभाव : सुख नवें भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक अत्यधिक भाग्यवान् तथा धर्मात्मा होता है। पिता, राज्य, व्यवसाय तथा स्त्री- पक्ष में भी उसे अत्यन्त सफलता मिलती है। अपनी विवेक-बुद्धि से वह यथेष्ट धन तथा सम्मान अर्जित करता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम की भी अत्यधिक वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति बहुत सुखी जीवन बिताता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश धनुलग्न : दशमभाव : सुख दसवें भाव में स्वराशि-स्थित उच्च के बुध के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में अत्यधिक सफलताएँ मिलती हैं। उसे पर्याप्त यश, धन तथा सम्मान प्राप्त होता है। सातवीं नीच-दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने के माता के सुख में कमी रहती है तथा भूमि, भवन के सुख में भी कुछ कठिनाइयाँ आती हैं।

४४३ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश धनुलग्न : एकादशभाव : बुध ग्यारहवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक की आमदनी खूब होती है। पिता, राज्य, व्यवसाय तथा स्त्री-पक्ष में भी पर्याप्त सुख, यश, धन, लाभ तथा सम्मान प्राप्त होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से विद्या, बुद्धि एवं सन्तान का सुख भी यथेष्ट मिलता है। ऐसा व्यक्ति धनी, सुखी, विद्वान् तथा यशस्वी होता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश धनुलग्न : द्वादशभाव : बुध बारहवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है, परन्तु बाहरी स्थानों के सम्बन्धों से लाभ प्राप्त होता है। पिता, राज्य तथा स्त्री के सुख की हानि होती है। जन्म-स्थान में रहकर व्यवसाय करने से घाटा होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रु-पक्ष एवं झगड़े-मुकदमे के मामलों में सफलता होती है। 'धनु' लग्न में 'गुरु' 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश धनुलग्न : प्रथमभाव : बुध पहले भाव में स्वराशि में स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक की शारीरिक सौन्दर्य एवं सुख की प्राप्ति होती है। भूमि तथा भवन का सुख भी मिलता है। पाँचवीं मित्र-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के क्षेत्र में भी सफलता मिलती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय का सुख भी मिलता है। नवीं मित्र-दृष्टि से नवम भाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की उन्नति होती है। ऐसा व्यक्ति विद्वान्, गुणी, सुन्दर, धनी, धर्मात्मा, मधुरभाषी, सज्जन तथा आनन्दी होता है।

४४४ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश धनु लग्न : द्वितीयभाव : गुरु दूसरे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक के धन तथा कुटुम्ब-सुख की हानि होती है। शारीरिक सुख तथा सौन्दर्य में भी कमी आती है। माता, भूमि तथा भवन का पक्ष भी कमजोर रहता है। पाँचवीं शत्रु-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रु-पक्ष में प्रभाव स्थापित होता है तथा झगड़े के मामलों में बुद्धिमानी से सफलता मिलती है। सातवीं उच्च-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु एवं पुरातत्त्व का लाभ होता है। नवीं मित्र-दृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सुख, सम्मान, यश तथा सफलता की प्राप्ति होती है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश धनु लग्न : तृतीयभाव : गुरु तीसरे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक को कुछ मतभेद के साथ भाई-बहिन का सुख प्राप्त होता है तथा पराक्रम में भी कमी आती है। भूमि, भवन तथा माता का सामान्य सुख मिलता है। पाँचवीं मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री सुन्दर मिलती है तथा स्त्री से सुख और व्यवसाय में सफलता मिलती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से नवम भाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की वृद्धि होती है। नवीं शत्रु-दृष्टि से एकादश भाव को देखने से आमदनी के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती रहती है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश धनु लग्न : चतुर्थभाव : गुरु चौथे भाव में स्वराशि में स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा भवन का श्रेष्ठ सुख मिलता है। शारीरिक सौन्दर्य एवं प्रभाव की प्राप्ति भी होती है। पाँचवीं उच्च तथा मित्र-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की वृद्धि होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता से सुख, राज्य से सम्मान तथा व्यवसाय से लाभ होता है। नवीं मित्र-दृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च अच्छी तरह चलता है तथा बाहरी स्थानों से लाभ होता है।

४४५ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश धनुलग्न : पंचमभाव : गुरु पाँचवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि तथा सन्तान-पक्ष में सफलता मिलती है। पाँचवीं मित्रदृष्टि से नवम भाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की वृद्धि होती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से एकादश भाव को देखने से आमदनी के क्षेत्र में कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है। नवीं दृष्टि से स्वराशि में प्रथम भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य, स्वास्थ्य, प्रतिष्ठा तथा प्रभाव को प्राप्ति होती है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश धनुलग्न : षष्ठभाव : गुरु छठे भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक को शत्रु-पक्ष तथा रोगादि से परेशानी होती है तथा बुद्धि-बल से उनका निराकरण होता है। शारीरिक सौन्दर्य तथा स्वास्थ्य में भी कमी आती है। माता का अल्प सुख होता है तथा भूमि एवं भवन का सुख प्राप्त नहीं होता। पाँचवीं मित्रदृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में लाभ, सुख तथा सम्मान को प्राप्ति होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी संबंधों से सुख मिलता है। नवीं नीचदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब की ओर से परेशानी रहती है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश धनुलग्न : सप्तमभाव : गुरु सातवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से सुख एवं सौन्दर्य तथा व्यवसाय में सफलता प्राप्त होती है। माता, भूमि तथा भवन का सुख भी मिलता है। श्रेष्ठ पाँचवीं शत्रुदृष्टि से एकादश भाव को देखने से आमदनी के क्षेत्र में कुछ असंतोष रहता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य, स्वास्थ्य एवं स्वाभिमान को प्राप्ति होती है। नवीं शत्रुदृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिनों से असन्तोष रहता है तथा पराक्रम में भी कुछ कमी आती है।

४४६ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश धनुलग्न : अष्टमभाव : गुरु आठवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि में स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक को आयु तथा पुरातत्त्व की श्रेष्ठ शक्ति का लाभ होता है। परन्तु शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्य में कमी आती है। पांचवीं मित्रदृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थान के संबंधों से लाभ मिलता है। सातवीं नीच तथा शत्रुदृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब के सुख में कमी आती है। १०४३ नवीं दृष्टि से स्वराशि में चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन का सुख कुछ कमी के साथ प्राप्त होता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश धनुलग्न : नवमभाव : गुरु नवें भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक के भाग्य की अत्यधिक वृद्धि होती है तथा धर्म का यथाविधि पालन होता है। माता, भूमि तथा भवन का सुख भी मिलता है। पाँचवीं दृष्टि से स्वराशि में प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य, स्वास्थ्य एवं यश की प्राप्ति होती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में कमी आती है। १०४४ नवीं मित्रदृष्टि से पंचम भाव को देखने से सन्तान-पक्ष से सुख मिलता है तथा विद्या एवं बुद्धि की वृद्धि होती है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश धनुलग्न : दशमभाव : गुरु दसवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सुख, लाभ, सम्मान तथा सहयोग प्राप्त होता है। शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वाभिमान की प्राप्ति भी होती है। पांचवीं नीच तथा शत्रुदृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब पक्ष से असन्तोष रहता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन का सुख प्राप्त होता है। नवीं १०४५ शत्रुदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष में बड़ी होशियारी से प्रभाव स्थापित होता है।

४४७ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश धनुलग्न: एकादशभाव: गुरु ग्यारहवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक शारीरिक श्रम द्वारा अपनी आय को बढ़ाता है। उसे माता, भूमि एवं भवन का सुख भी प्राप्त होता है। पाँचवीं शत्रुदृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहनों से असन्तोष रहता है तथा पराक्रम की वृद्धि भी नहीं हो पाती। सातवीं मित्रदृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या, बुद्धि एवं सन्तान का लाभ होता है। नवीं मित्रदृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में लाभ की प्राप्ति होती है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश धनुलग्न: द्वादशभाव: गुरु बारहवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी संबंधों से लाभ होता है। शरीर में कुछ कमजोरी भी रहती है। पाँचवीं दृष्टि से स्वराशि में चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन का सुख प्राप्त होता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रु- पक्ष में बुद्धिमानी से प्रभाव स्थापित होता है। नवीं उच्च तथा मित्रदृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु की वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। ऐसे व्यक्ति का दैनिक जीवन भाव से बीतता है। 'धनु' लग्न में 'शुक्र' 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश धनुलग्न: प्रथमभाव: शुक्र पहले भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक का स्वास्थ्य कुछ कमजोर रहता है, परन्तु परिश्रमी तथा चतुर होता है। शत्रु-पक्ष पर विजय मिलती है। यशस्वी भी होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री से कुछ मतभेद-युक्त सुख मिलता है तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में चतुराई द्वारा सफलता एवं लाभ की प्राप्ति होती है।

४४८ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश धनुलग्न : द्वितीयभाव : शुक्र दूसरे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक को धन की अच्छी शक्ति मिलती है, परन्तु कुटुम्बियों से मतभेद रहता है। शत्रु-पक्ष से लाभ होता है तथा उस पर प्रभाव भी स्थापित होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु एवं पुरातत्त्व की शक्ति में वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति प्रभावशाली तथा प्रतिष्ठित होता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश धनुलग्न : तृतीयभाव : शुक्र तीसरे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में वृद्धि होती है तथा कुछ कमी के साथ भाई-बहिनों का सुख भी मिलता है। धन का लाभ होता है तथा शत्रु-पक्ष पर प्रभाव बना रहता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्यो- न्नति में कठिनाइयाँ आती हैं तथा धर्म में भी विशेष रुचि नहीं रहती। सामान्यतः जीवन सुखी बना रहता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश धनु लग्न : चतुर्थभाव : शुक्र चौथे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित उच्च 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि एवं भवन का श्रेष्ठ सुख प्राप्त होता है। आमदनी अच्छी रहती है तथा शत्रु-पक्ष पर विजय प्राप्त होती है। सातवीं नीच-दृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता से हानि तथा राज्य के क्षेत्र में असफलता मिलती है। व्यवसाय की उन्नति के मार्ग में भी अनेक कठिनाइयाँ आती हैं।

४४६ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश धनुलग्न : पंचमभाव : शुक्र पाँचवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव के जातक को विद्या, बुद्धि का श्रेष्ठ लाभ होता है, परन्तु सन्तान-पक्ष में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है। वाणी की शक्ति, चातुर्य एवं कला का लाभ भी होता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में एकादश भाव को देखने से विद्या-बुद्धि द्वारा आमदनी की वृद्धि होती है तथा शत्रु-पक्ष पर विजय प्राप्त होती है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश धनुलग्न : षष्ठभाव : शुक्र षष्ठ भाव में स्वराशि-स्थित 'शुक्र' के प्रभाव के जातक शत्रु-पक्ष पर भारी प्रभाव रखता है तथा झगड़ों से लाभ उठाता है। परिश्रम द्वारा धन एवं आमदनी के क्षेत्र में भी अच्छी सफलता मिलती है। ननसाल-पक्ष से भी लाभ होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से कुछ कठिनाइयों के साथ अच्छा लाभ होता रहता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश धनुलग्न : सप्तमभाव : शुक्र सातवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से कुछ मतभेद- युक्त लाभ मिलता है। व्यवसाय क्षेत्र में भी कठिनाइयों के साथ लाभ प्राप्त होता है। शत्रु-पक्ष पर प्रभाव स्थापित होता है तथा मूत्रेन्द्रिय में विकार की संभावना भी रहती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शारीरिक शक्ति एवं प्रभाव की प्राप्ति होती है।

४५७ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश धनुलग्न : अष्टमभाव : शुक्र आठवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक की आयु में वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का लाभ भी होता है। आमदनी के मार्ग में कठिनाइयां आती हैं। बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से परिश्रम द्वारा लाभ मिलता है। शत्रुपक्ष से भी परेशानी होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से कुटुम्ब का सहयोग प्राप्त होता है तथा धन-वृद्धि के लिए विशेष परिश्रम करना पड़ता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश धनुलग्न : नवमभाव : शुक्र नवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को भाग्योन्नति के लिए विशेष परिश्रम करना पड़ता है। तथा धर्म में भी कम श्रद्धा रहती है। अपनी चतुराई द्वारा शत्रु-पक्ष से लाभ भी उठाता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति भाग्यवान् समझा जाता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश धनुलग्न : दशमभाव : शुक्र दसवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित नीच के 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा व्यवसाय के पक्ष में कठिनाइयों का अनुभव होता है। भाग्योन्नति में शत्रुपक्ष के कारण रुकावटें आती हैं। सातवीं उच्च दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन का सुख प्राप्त होता है तथा घर के भीतर प्रभाव भी बना रहता है।

४५१ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश धनुलग्न : एकादशभाव : शुक्र ग्यारहवें भाव में स्वराशि में स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक की आमदनी में वृद्धि होती है तथा शत्रु पक्ष से विशेष लाभ मिलता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से पंचम भाव को देखने से विद्या, बुद्धि के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है, परन्तु बाद में बड़ा गुणी, चतुर तथा विद्वान् भी बनता है। सन्तान-पक्ष से त्रुटिपूर्ण साथ प्राप्त होता है। १०५८ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश धनु लग्न : द्वादशभाव : शुक्र बारहवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी संबंधों से लाभ भी होता है। झगड़े तथा शत्रुओं के कारण कुछ परेशानी होती है, परन्तु अपनी चतुराई से लाभ भी उठाता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर पूर्ण प्रभाव स्थापित होता है। ऐसा व्यक्ति संघर्षपूर्ण जीवन बिताता है। १०५९ 'धनु' लग्न में 'शनि' 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश धनुलग्न : प्रथमभाव : शनि पहले भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य में कमी आती है। परिश्रम से धन तथा कुटुम्ब का सुख मिलता है। तीसरी दृष्टि से स्वराशि में तृतीय भाव को देखने से पराक्रम तथा भाई-बहिनों के सुख में वृद्धि होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता मिलती है। दसवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य १०६०

४५२ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश धनु लग्न : द्वितीयभाव : शनि दूसरे भाव में स्वराशि-स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब का पर्याप्त सुख प्राप्त होता है, परन्तु भाई-बहिन के सुख में कुछ कमी रहती है। तीसरी शत्रुदृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का अल्प सुख मिलता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की वृद्धि होती है। दसवीं उच्चदृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी खूब रहती है तथा कभी-कभी आकस्मिक धन-लाभ भी होता है। १०६१ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश धनु लग्न : तृतीयभाव : शनि तीसरे भाव में स्वराशि-स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में विशेष वृद्धि होती है तथा भाई- बहिन का सुख कुछ कमी के साथ मिलता है। तीसरी नीचदृष्टि से पंचम भाव को देखने से सन्तान-पक्ष से कष्ट होता है तथा विद्या-बुद्धि में कमी रहती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य तथा यश की उन्नति होती है परन्तु धर्म में श्रद्धा कम रहती है। दसवीं शत्रुदृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों का सम्बन्ध भी लाभदायक सिद्ध नहीं होता। १०६२ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश धनु लग्न : चतुर्थभाव : शनि चौथे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को माता के सुख में कमी रहती है तथा भूमि, भवन का सामान्य सुख प्राप्त होता है। भाई-बहिन तथा कुटुम्ब का सुख भी असन्तोषजनक रहता है। तीसरी मित्रदृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव रहता है तथा झगड़ों से लाभ भी होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से दशम भाव को देखने से १०६३ पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र की उन्नति होती है। दसवीं शत्रुदृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्य में कमी आती है।

४५३ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश धनु लग्न : पंचमभाव : शनि पाँचवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित नीच के 'शनि' के प्रभाव से जातक को सन्तान-पक्ष से कष्ट मिलता है तथा विद्या, बुद्धि के क्षेत्र में कमी रहती है। तीसरी मित्रदृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता मिलती है। सातवीं उच्चदृष्टि से एकादश भाव को देखने से आमदनी खूब रहती है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वितीय भाव को देखने से कौटुम्बिक सुख तथा धन-संचय के लिए गुप्त युक्तियों का आश्रय लेना पड़ता है तभी सामान्य सफलता मिलती है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश धनु लग्न : षष्ठभाव : शनि छठे भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर भारी प्रभाव रखता है तथा झगड़ों से लाभ उठाता है। कुटुम्बियों से कुछ विरोध भी रहता है। तीसरी शत्रुदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु में वृद्धि होती है, परन्तु पुरातत्त्व का लाभ कम होता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है। बाहरी संबंधों से भी हानि होती है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि में तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिनों से वैमनस्य रहता है, परन्तु पराक्रम की वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति हिम्मती तथा पुरुषार्थी होता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश धनु लग्न : सप्तमभाव : शनि सातवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को स्त्री का लाभ तो होता है, परन्तु उससे सुख कम ही मिलता है, तथापि दैनिक व्यवसाय में पर्याप्त लाभ होता है। भाई-बहिन तथा कुटुम्बियों से अच्छे संबंध रहते हैं। तीसरी शत्रुदृष्टि से नवमभाव को देखने से धर्म तथा भाग्य के क्षेत्र में रुकावटें आती हैं। सातवीं शत्रुदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शरीर में कुछ कष्ट रहता है। दसवीं शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन के सुख में कमी आ जाती है और उसे अपना स्थान छोड़कर परदेश में भी रहना पड़ता है।

४५४ 'धनु' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश धनु लग्न : अष्टमभाव : शनि आठवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक की आयु में वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का भी लाभ होता है। दैनिक सुख, धन-संचय तथा भाई-बहिन के सुख में कमी रहती है। तीसरी मित्र-दृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सफलताएँ मिलती हैं। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वितीयभाव को देखने से धन-कुटुम्ब का सामान्य सुख मिलता है। दसवीं [चित्र: कुण्डली १०६७] नीच-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के पक्ष में कमी बनी रहती है। 'धनु' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश धनु लग्न : नवमभाव : शनि नवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को भाग्योन्नति एवं धर्म- पालन में बाधाएं आती हैं। धन-कुटुम्ब का सामान्य- सुख मिलता है। तीसरी मित्र तथा उच्च-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी खूब रहती है तथा कभी-कभी आकस्मिक धन-लाभ भी होता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि [चित्र: कुण्डली १०६८] होती है। दसवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है तथा झगड़े-झंझटों से लाभ होता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश धनु लग्न : दशमभाव : शनि दसवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को पिता से सहयोग, राज्य से सम्मान तथा व्यवसाय से लाभ मिलता है। भाई-बहिनों के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। तीसरी शत्रु- दृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्ध भी असन्तोषजनक रहते हैं। सातवीं शत्रु-दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से [चित्र: कुण्डली १०६९] माता, भूमि एवं भवन के सुख में कमी रहती है। दसवीं मित्र-दृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री-पक्ष से सुख तथा दैनिक व्यवसाय में सफलता की प्राप्ति होती है।