भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४६ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश धनुलग्न : पंचमभाव : शुक्र पाँचवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव के जातक को विद्या, बुद्धि का श्रेष्ठ लाभ होता है, परन्तु सन्तान-पक्ष में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है। वाणी की शक्ति, चातुर्य एवं कला का लाभ भी होता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में एकादश भाव को देखने से विद्या-बुद्धि द्वारा आमदनी की वृद्धि होती है तथा शत्रु-पक्ष पर विजय प्राप्त होती है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश धनुलग्न : षष्ठभाव : शुक्र षष्ठ भाव में स्वराशि-स्थित 'शुक्र' के प्रभाव के जातक शत्रु-पक्ष पर भारी प्रभाव रखता है तथा झगड़ों से लाभ उठाता है। परिश्रम द्वारा धन एवं आमदनी के क्षेत्र में भी अच्छी सफलता मिलती है। ननसाल-पक्ष से भी लाभ होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से कुछ कठिनाइयों के साथ अच्छा लाभ होता रहता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश धनुलग्न : सप्तमभाव : शुक्र सातवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से कुछ मतभेद- युक्त लाभ मिलता है। व्यवसाय क्षेत्र में भी कठिनाइयों के साथ लाभ प्राप्त होता है। शत्रु-पक्ष पर प्रभाव स्थापित होता है तथा मूत्रेन्द्रिय में विकार की संभावना भी रहती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शारीरिक शक्ति एवं प्रभाव की प्राप्ति होती है।