भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
पृष्ठ 441, कुल 638 में से
संदर्भ में पढ़ें४५७ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश धनुलग्न : अष्टमभाव : शुक्र आठवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक की आयु में वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का लाभ भी होता है। आमदनी के मार्ग में कठिनाइयां आती हैं। बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से परिश्रम द्वारा लाभ मिलता है। शत्रुपक्ष से भी परेशानी होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से कुटुम्ब का सहयोग प्राप्त होता है तथा धन-वृद्धि के लिए विशेष परिश्रम करना पड़ता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश धनुलग्न : नवमभाव : शुक्र नवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को भाग्योन्नति के लिए विशेष परिश्रम करना पड़ता है। तथा धर्म में भी कम श्रद्धा रहती है। अपनी चतुराई द्वारा शत्रु-पक्ष से लाभ भी उठाता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति भाग्यवान् समझा जाता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश धनुलग्न : दशमभाव : शुक्र दसवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित नीच के 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा व्यवसाय के पक्ष में कठिनाइयों का अनुभव होता है। भाग्योन्नति में शत्रुपक्ष के कारण रुकावटें आती हैं। सातवीं उच्च दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन का सुख प्राप्त होता है तथा घर के भीतर प्रभाव भी बना रहता है।